*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Sunday, November 23, 2014

जन्मदिन- अंदाज़ अपना अपना

    जन्मदिन- अंदाज़ अपना अपना

एक 'माया'मनाया करती थी अपना जन्मदिन,
                   हजारों के हजारों नोटों की माला पहन कर
एक 'मुलायम'ने मनाया ,बड़ी शौकत शान से ,
                     मंगाई लन्दन से बग्घी ,जुलुस निकला बैठ कर
केक लंबा पिचहत्तर फिट,मंगाया ,काटा ,गया ,
                    लोहियावादी मुखौटा,राजसी  अंदाज था
किन्तु 'मोदी'ने मनाया ,सादगी से जन्म दिन,
                    बिना आडम्बर किये और माँ का आशीर्वाद पा

घोटू 

Thursday, November 20, 2014

निमंत्रण

           निमंत्रण

दे गए मुझको निमंत्रण ,स्वप्न थे कल रात आ के
कल मेरे अरमान की शादी तुम्हारी कामना   से
तुम्हारे स्वर्णिम बदन पर ,कल सुबह हल्दी चढ़ेगी
चन्द्र मुख यूं ही सुहाना  ,चमक और ज्यादा बढ़ेगी
तारिका की चुनरी में ,सज संवर तुम आओगी  तो,
यूं ही तो मैं  बावरा हूँ , धड़कने  मेरी   बढ़ेगी
देख कर सौंदर्य अनुपम ,गिर न जाऊं डगमगा के
कल मेरे अरमान की शादी तुम्हारी कामना से
शाम मैं घोड़ी चढूंगा,आऊंगा  बारात लेकर
डाल वरमाला  गले में ,बांध लोगी तुम उमर भर
मान हम साक्षी अगन को ,सात फेरे ,साथ लेंगे ,
सात वचनों को में बंधेंगे ,निभाने को जिंदगी भर
तृप्ती कितनी पाउँगा में ,सहचरी  तुमको बना के 
कल मेरे अरमान की शादी तुम्हारी   कामना से

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

आम का वृक्ष -उमर का असर

          आम का वृक्ष -उमर का असर

आम का वृक्ष,
जो कल तक ,
दिया करता था मीठे फल
अब छाँव देता है केवल
इसलिए उपेक्षित है आजकल
भले ही अब भी ,
उस पर कोकिल कुहकती है
पंछी कलरव करते है,
शीतल हवाएँ बहती है
पर,अब तो बस केवल
पूजा और शुभ अवसरों पर ,
कुछ पत्ते बंदनवार बना कर ,
लटका  दिये जाते है
जो उसकी उपस्तिथि  अहसास आते है
उसके अहसानो का कर्ज ,
इस तरह चुकाया जाता  है
कि उसकी सूखी लकड़ी को,
हवन में जलाया जाता है
फल नहीं देने  फल ,
उसे इस तरह मिल रहा  है 
आम का वृक्ष ,
अब बूढ़ा जो हो रहा  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जीवन संध्या

       जीवन संध्या

बड़ी बड़ी बुलंद इमारतें भी ,
शाम के धुंधलके में ,
नज़र  नहीं आती है
अस्तित्व होते हुए भी ,
 गुम  हो जाती है
ऐसा ही होता है,
जब जीवन की संध्या आती है

घोटू

बदलाव -बढ़ती उमर का

            बदलाव -बढ़ती  उमर का

पेट कल भी भरा करता था इसी से ,
                पेट भरती  आजकल  भी तो यही है
फर्क ये है कल गरम फुलका नरम थी,
                आजकल ये डबल रोटी   हो गयी  है
साथ जिसके जागते थे रात भर हम ,
                  जगाती  है हमें अब भी ,रात भर वो
तब जगा  करते थे मस्ती मौज में हम,
                 नहीं सोने देती है अब खांस कर वो
पहले सहला ,लगा देते आग तन में,
                 हाथ नाजुक ,कमल पंखुड़ी से नरम जो
हो गए है आजकल वो खुरदुरे से ,
                 अब भी राहत देते है खुजला   बदन को
था  ज़माना प्रेम से हमको खिलाती ,
                  कभी रसगुल्ला ,जलेबी या मिठाई
आजकल  मिठाई पर पाबंदियां है ,
                  देती सुबहो शाम है हम को दवाई  
रोकती हमको पुरानी हरकतों से ,
                   कहती ब्लडप्रेशर  तुम्हारा बढ़ न जाये
जोश होता हिरण ,रहते मन मसोसे ,
                    बुढ़ापे ने हमको क्या क्या  दिन दिखाये

मदन मोहन बाहेती''घोटू'

Monday, November 17, 2014

तुम्हारे हाथों में

              तुम्हारे हाथों में

जो हाथ पकाते जब खाना ,तो गजब स्वाद भर जाता है
छू लेती जिन्हे हरी मेंहदी ,तो लाल रंग   रच जाता   है
जिन हाथों का कर पाणिग्रहण ,रिश्ता बंधता जीवन भर का
जिन हाथों की ही फुर्ती से ,चलता है काम सभी घर का
जो हाथ प्रेम से सहला कर ,पति मन में प्रेम जगाते है
जिन हाथों के ही बाहुपाश में ,दो प्रेमी बंध  जाते है
जिन हाथों में आ पैसा भी ,बहती गंगा बन जाता है
बस एक इशारा जिनका सब पतियों को खूब नचाता है
जिन हाथों में बेलन आता ,तो रोटी बना खिलाता है
गुस्से में पर वो ही बेलन ,हथियार बड़ा बन जाता है
रोता बच्चा खुश हो जाता है आकर के जिन हाथों में
अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में
 
मदन मोहन  बाहेती'घोटू'

Friday, November 14, 2014

शिकायत-तकिये की

         शिकायत-तकिये की

एक तकिये ने अपनी मालकिन से की ये शिकायत ,
              अकेले छोड़ कर के  साहब को जब आप जाते है
आप तो चैन से मइके में जाकर मौज करते है,
                इधर दो रात मे ही निकल मेरे प्राण   जाते है
बदल जाता है मेरा हुलिया ,हालत बिगड़ती है,
                 मौन सहता हूँ सब कुछ ,बोल भी तो मैं नहीं  सकता,
कभी टेढ़ा ,कभी सीधा,कभी ऐसे ,कभी वैसे,
                  बड़ी बेरहमी से साहब जी, मुझको दबाते है

घोटू 

जाती बहार के फल

        जाती बहार के फल

खिलता है तो लगता है सुहाना और महकता ,
                मौसम में  हर एक फूल पर चढ़ता शबाब है
अनुभव की बात आपको लेकिन हम बताएं ,
                  गुलकंद बन ,अधिक मज़ा देता  गुलाब है
मौसम में तो मिलते थे हमें रोज ही खाने ,
                  अब मुश्किलों से मिलते है,वो भी कभी कभी,
खाकर के देखो आम तुम जाती बहार के ,
                    पड़ जाते नरम,स्वाद में पर लाजबाब है

घोटू

बढ़तीं उमर की रईसी

          बढ़तीं उमर की रईसी

हम हो गए रईस है इस बढ़ती उमर में,
         सर पर है चांदी और कुछ सोने के दांत है
किडनी में,गॉलब्लेडर में ,स्टोन कीमती,
         शक्कर का पूरा कारखाना ,अपने साथ है
अम्बानी के तो गैस के कुवें समुद्र में ,
         हम तो बनाते गैस खुद ही ,दिन और रात है
है पास में इतना बड़ा अनुभव का खजाना ,
         जिसको कि बांटा करते है हम ,खुल्ले हाथ है    

घोटू

पूजा और प्रसाद

         पूजा और प्रसाद

बाद शादी के पडी बस ये ही आदत
किया करते रोज पत्नी की इबादत
और खाने मिल रहे पकवान तर है
चैन से ये जिंदगी होती बसर  है
नहीं पत्थर की प्रतिमा पूजते हम
हुस्न की जीवित प्रतिमा पूजते हम
पूर्ण श्रध्दा ,आस्था की  भावना से
सर नमाते,प्रेम की हम  कामना से
देवी के श्रृंगार हित नव वसन  लाते
स्वर्ण आभूषणो से उसको सजाते
प्रेम की भर भावना और जोश तन में
रतजगा भी किया करते ,कीर्तन में
आरती में लीन  होते,लगन से हम
भोग का परशाद पाते है तभी हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सर्दी जुकाम

           सर्दी  जुकाम

गमन आगमन पवन किया करती जिस पथ पर ,
                   उस पथ से अब बहती  गंगा जमुना  धारा
दबी पवन उद्वेलित होकर बड़े कोप से ,
                  छूट   तोप की तरह  ,गूंजा देती घर सारा
शीत  हो रही व्याप्त  और मौसम सिहरन  का ,
                  चली गयी है ऊष्मा फिर भी तप्त  बदन है
नहीं समझ में आता है क्या मुझे हुआ है ,
                   बैचैनी सी छाई ,तन में भारी पन  है
मुश्किल होती ,श्वासोच्छ्वास  मुझे  करने में ,
                   और चैन से सोना आज हराम होगया
अम्मा बोली,घुमा फिरा कर बातें मत कर ,
                  काढ़ा पी ले,तुझको सिर्फ  जुकाम होगया

घोटू

वक़्त वक़्त की बात

            वक़्त वक़्त की बात

रहता किसी  का  वक़्त  कभी  एक सा नहीं
किस्मत बदलती सबकी जब आता समय सही
रहती  है  दबी  ,आठ माह ,बक्से  के अंदर
मौसम में सर्दियों के जब  आती है निकल कर
तो प्यार सबका कितना फिर पाती रजाइयां
कितने  हसीन  जिस्मो  पर, छाती रजाइयां
हम भी रजाई की तरह ,अरमान   दबाये
बैठे है इन्तजार में  कि  अच्छे  दिन आएं
किस्मत हमारी ,हम पे भी हो  जाये मेहरबाँ
हमको भी अपनी बाहों में भर लेगी  दिलरुबां

घोटू

नाम का क्या काम

            घोटू के छक्के          
           नाम का क्या काम
                       १
'सर 'सर'कह कर जूनियर ,सर पर हमें चढाय
और अफसर ,सर नेम से,केवल  हमें  बुलाय 
केवल  हमें  बुलाय ,कहे 'लल्लाजी '  भौजी
बीबी काम  चलाय हमें कह 'ऐ  जी' ओ  जी'
बच्चे कहते 'पापा 'और  'मुन्ना'  माताजी
और 'साहब जादे 'कहते  है हमें   पिता जी
                        २
लम्बे चौड़े नाम का ,फैशन अब गुमनाम
'शार्ट फॉर्म 'के नाम से ,अब चलता है काम
अब चलता है काम ,हमारे इनिशियल से
 कोई  हमें जानता सिरफ़  फ्लेट  नंबर से
कह 'घोटू' कविराय ,कहे कन्याये 'अंकल'
चेहरा,नाम 'फेस बुक' पर ही दिखता केवल

घोटू

Wednesday, November 12, 2014

स्वच्छता अभियान

           स्वच्छता अभियान

तेरे मन में ,मेरे मन में,सबके मन में मैल ,
                              निकाले उसको  कैसे ?
लालच,स्वार्थ ,घृणा ,हिंसा का कचरा  फैला
                               बुहारे    उसको  कैसे ?
चला स्वच्छ अभियान ,हाथ में झाड़ू लेकर
 हटा  गंदगी, होगे  गाँव,सड़क ,सब सुन्दर
इधर उधर बिखरा कचरा तो बुहर  जाएगा
लीप पोत  कर ,रंग घरों का निखर जाएगा
किन्तु स्वच्छता तन संग, मन की आवश्यक है ,
                                       सँवारे  उसको कैसे?
तेरे मन में,मेरे मन में  ,सबके मन में  मैल ,
                                        निकाले उसको कैसे?
कलुषित हुए विचार,मनो पर मैल  चढ़ रहा
दिन दिन बेईमानी ,भ्रष्टाचार  बढ़  रहा
भुला दिए आदर्श,संस्कृति ,संस्कार  के
नित्य उजागर काण्ड हो रहे व्यभिचार के
चिंदी चिंदी बिखर रही है ,अबलाओं  की लाज,
                                 संभाले उसको कैसे ?
मेरे मन में,तेरे मन में,सबके  मन में मैल  ,
                                  निकाले उसको कैसे?

मदन मोहन बाहेती''घोटू'

Wednesday, November 5, 2014

मेंहदी

                   मेंहदी

हरे पत्ते थे  झाडी  के,  खड़े  थे  यूं  ही जंगल में
मगर किस्मत गयी उनकी ,बदल बस एक ही पल में
हुए कुर्बान पिस कर के ,हुस्न का साथ जब पाया
हाथ में उनके जब आये ,रंग किस्मत का पलटाया
हो गया लाल रंग उनका , समां  कर तन में गौरी के
छोड़ दी छाप कुछ ऐसी  ,बस गए मन में गौरी के
सुहागन सज गयी प्यारी ,पिया ने  हाथ जब  चूमा
प्यार कुछ ऐसा गरमाया ,चढ़ गया  रंग दिन दूना
नहीं इतना सिरफ़ केवल,जोर किस्मत ने फिर मारा
चढ़ा कर सर पे गौरी ने ,सजाया रूप निज प्यारा
रंग लिए केश सब अपने ,चमक जुल्फों में यूं आयी
छटा बालों की यूं निखरी ,सभी के मन को वो भायी
चिन्ह सुहाग का तब से ,बतायी जाती  मेंहदी है
तीज,त्योंहार,शादी में ,लगाई जाती मेंहदी  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, November 4, 2014

इलाज बतलाइये

         इलाज बतलाइये

किसी चीज को अगर चलाना ,लुब्रिकेंट लगाते है
इससे वो अच्छी चलती है,ऐसा लोग बताते  है
खुश्की की खुजली चलती है,जब जब सर्दी आती है
लुब्रिकेंट लगा देने से ,लेकिन कुछ  थम जाती  है
उल्टा चक्कर,परेशान पर ,मैं  खुश्की की खुजली से
कोई यदि उपचार बता दे ,धन्यवाद  दूंगा  जी से

घोटू

धरम-करम

          धरम-करम

धर्म के नाम पर केवल,हजारों खर्च कर देंगे
मगर भूखे गरीबों को,चवन्नी तक नहीं देंगे
मोक्ष की कामना या लालसा ले स्वर्ग की मन में,
तीर्थ और देव दर्शन में ,बिता सारी उमर देंगे
पुजारी पंडितों ने बुन रखे है जाल कुछ ऐसे ,
बनाये उस शिकंजे में ,फंसा हम अपना सर देंगे
पेट भूखे का भर दो गर ,मदद निर्धन की करदो गर
तहे दिल से दुआएं वो ,तुम्हे सारी  उमर  देंगे
मगर पाखंडियों के फेर  में जो रहोगे  उलझे ,
पता ना कल को क्या होगा ,बुरा वो आज कर देंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शोर या रौनक

             शोर या रौनक

डालों पर पंछी बैठे हो ,और नहीं हो कुछ कलरव
सन्नाटा छाया हो तरु पर ,नहीं कभी भी यह संभव
चार औरतें यदि मिल बैठे ,और छाई हो चुप्पी सी
वैसे ये तो नामुमकिन है ,क्या हो सकता  ऐसा भी
मंदिर में घंटा ध्वनी ना हो,और नहीं संकीर्तन हो
मन भक्तों का नहीं लगेगा ,न ही रुचेगा  भगवन को
बच्चे वाले घर में ना हो,शोर शराबा ,चहल पहल
ऐसे घर में मुश्किल होता ,हमें बिताना ,पल,दो पल
बीबी की हरदम की बक बक ,हमको बड़ा सुहाती है
इसी बहाने घर में  थोड़ी ,   रौनक तो हो जाती  है
बच्चे और बीबी  की बातें ,रौनक है,मत शोर कहो
है जीवन का ये सच्चा सुख ,सुन आनंद विभोर रहो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

नव कविता

          नव कविता

मैंने  उनकी  सुंदरता  पर
चार पंक्तियाँ लिख दी केवल
उनने मुझे दे दिया उत्तर
एक प्यारा सा चुम्बन देकर
मेरी कलम सख्त,मसि काली
उनके होंठ नरम और लाली
मैंने शब्दों में उलझाया
उनने  जुल्फों में उलझाया
मेरी भाषा अलंकार की
उनकी भाषा शुद्ध प्यार की
मेरे शब्द पड़  गए बौने
जब उनके नाजुक होठों ने
मन का सारा प्यार घोल कर
मेरे कागज़ से कपोल पर
अपनी सुन्दर,प्यारी लिपी में
बड़े प्यार से, धीमे ,धीमे
ऐसा सुन्दर कुछ लिख डाला
जिसने किया  मुझे मतवाला
सिर्फ लेखनी की छुवन ने
उनकी मदमाती चितवन ने
ऐसी कविता मुझे सुना  दी
मेरे तन में आग लगा दी
दीवाना होकर पागल मैं
कलम छोड़ कर प्रत्युत्तर में
उनकी अपनी ही शैली में
प्यारी,मनहर,अलबेली में
उनकी ही भाषा में सुन्दर
उनके तन पर ,उनके मन पर
जगह जहाँ भी पायी खाली
मैंने नव कविता लिख डाली

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, November 2, 2014

सर्दी का आगाज

           सर्दी का आगाज

कल नारियल के तैल की शीशी में ,हिमकण से दिखलाये
कल दादी ने रात को ओढ़ने को ,कम्बल थे निकलाये
कल.अल्पवस्त्रा ललनाएँ ,वस्त्र से आवृत  नज़र आयी
कल सवेरे सवेरे ,कुनकुनी  सी धूप थी मन को भाई 
कल ठन्डे पानी से नहाने पर ,सिहरन सी आने लगी थी
कल से  पूरे बदन में कुछ खुश्की  सी  छाने लगी थी
कल पंछी अपने अपने  नीड़ों में कुछ जल्दी जा रहे थे
कल बिजली के पंखे के तीनो  ही पंख नज़र आ रहे थे
कल रात थोड़ी लम्बी और दिन लगा  ठिगना  था
कल हमारे बदन से भी हुआ गायब  सब पसीना  था
कल सुबह कुछ कोहरा था , बदन  ठिठुराने लगा है 
ऐसा लगता है कि अब सर्दी का मौसम आने लगा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'