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Monday, July 27, 2015

दो बद्दी वाली चप्पल

  दो बद्दी वाली चप्पल

यह दो बद्दी वाली चप्पल
सस्ती,टिकाऊ,नाजुक,मनहर
चाहे  बजार या  बाथरूम,
ये साथ निभाती है हरपल
चाहे नर हो चाहे नारी ,
सबको लगती प्यारी,सुन्दर
ना मन में कोई भेदभाव ,
सब की ही सेवा में तत्पर
सब को आजाती ,कोई भी,
पावों में डाला,देता चल
गन्दी होती तो धुल जाती,
और बहुत दिनों तक जाती चल
हम भी इसके गुण  अपनायें ,
और काम आएं सब के प्रतिपल
वो ही मृदु सेवाभाव  लिए,
सबकी  सेवा में रह तत्पर
गर्मी में पैर न जलने दें,
उनको ना  चुभने दें पत्थर
हम साथ निभाएं,काम आएं
यह जीवन होगा तभी सफल

घोटू

बुढ़ापे में नींद कहाँ है आती

  
 
कुछ तो बीबी खर्राटे भरती है , 
                     और कुछ बीते दिन की याद सताती 
यूं ही बदलते इधर उधर हम करवट,
                        बुढ़ापे  में  नींद  कहाँ  है   आती 
कभी पेट में गैस बना करती है ,
                         और कभी  सिर में होता भारीपन 
कंधे ,गरदन कभी दर्द करते है,
                          पैरों या पिंडली में होती तड़फन 
अंग अंग को दर्द  कचोटा करता ,
                          कभी  काटने लगता है सूनापन 
बार बार प्रेशर बनता  ब्लेडर में,
                          बाथरूम जाने को करता है मन 
कभी हाथ तो कभी  पैर दुखते है ,
                            एक अजीब सी तड़फन है तड़फ़ाती 
यूं ही बदलते  इधर उधर हम करवट,
                                बुढ़ापे   में  नींद  कहाँ  है  आती 
भूले  भटके यदि लग जाती झपकी,
                                तो फिर सपने आकर हमें सताते 
बार बार मन में घुटती रहती है,
                                कुछ अनजान ,अधूरी मन की बातें 
जब यादों के बादल घुमड़ा करते ,
                                आंसू   की  होने  लगती  बरसातें
मोह माया के बंधन को अब छोडो,
                                 यूं ही बस हम है खुद को समझाते 
ऐसी नींद उचटती है आँखों से ,
                                भोर तलक फिर नहीं लौट कर आती 
यूं ही बदलते इधर उधर हम करवट ,
                                 बुढ़ापे   में नींद   कहाँ है  आती 

मदन मोहन  बाहेती'घोटू' 
                                 

गोलगप्पे

     
एक बड़े माल के ,नामी रेस्तराँ में,
छह गोलगप्पे खाने के लिये 
हमने पूरे साठ  रूपये खर्च किये 
कूपन देकर ,इन्तजार करने के बाद 
एक प्लेट आयी हमारे हाथ 
जिसमे एक कटोरी में पुदीने का पानी डाला था 
दूसरी में छह गोलगप्पे ,
और उबले हुए आलू का मसाला था 
खुद ही गोलगप्पे में ,हमने जब छेद किये 
उसमे ही एक दो तो ,बेचारे टूट गये 
बाकी में भर कर आलू का मसाला 
धीरे धीरे चम्मच से ,पानी था डाला 
तब जाकर मुश्किल से गोलगप्पे खा पाये 
ऐसे में वो गली के ठेले वाले के ,
वो प्यारे गोलगप्पे याद आये 
वो ठेले वाला ,आपको प्रेम से बुलाता है 
दोना पकड़ाता है ,
फिर आपकी मर्जी के मुताबिक़ ,
आटे  के या सूजी के गोलगप्पे खिलाता है 
 छेद  वो ही करता है ,आलू भी भरता है 
 फिर आपके स्वादानुसार ,खट्टा मीठा पानी भर ,
एक एक गोलगप्पा ,दोने में धरता है 
जब तक आपके मुंह में ,
पहले गोलगप्पे का जायका घुलता है 
तब तक ही आपको ,दूसरा गोलगप्पा  मिलता है 
आखिर में दोना भर ,खट्टा मीठा पानी भी ,
मुफ्त  देता है 
उस पर छह गोलगप्पों के ,
सिर्फ दस रूपये लेता है 
माल में ,छह गुने पैसे भी खर्च करो 
फिर खुद ही चम्मच से ,गोलगप्पे में पानी भरो 
फिर बड़े अनुशासन में ,धीरे धीरे खाओ 
भले ही पानी,खट्टा या तीखा है 
अरे ये भी कोई चाट खाने का तरीका है 
चाट खाओ और चटखारे  ना लो,
ऐसे भी कोई चाट खाता है 
गोलगप्पे का असली मज़ा तो ,
ठेले पर खड़े होकर ,
चटखारे ले लेकर ,खाने में आता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

मॉल कल्चर

          मॉल कल्चर

बड़े बड़े मालों के ,शोरूमों की शॉपिंग ,
                      प्लास्टिक की  थैली के भी पैसे लगते है
वही चीज सेल लगा ,दे आधे दामो में ,
                      तभी पता लगता है,वो कितना ठगते है
ब्रांड की चिप्पी से ,दाम बहुत बढ़ जाते ,
                      बिन चिप्पी के उनकी ,कीमत बस आधी है
गाँवों में वही चीज ,लाला  की गुमटी पर,
                       मोलभाव करने पर    सस्ती मिल जाती है
असल में मालों का ,अपना ही खर्चा है ,
                         सेल्स गर्ल,ऐ.सी. है, बिजली जलाते है
इन  सबकी कीमत भी,सौदे में जुड़ती है ,
                           इन सबका खर्चा भी ,हम ही चुकाते है
 पर जब भी होता है ,घर घर में पॉवरकट,
                            मज़ा लेने ऐ ,सी. का,लोग यहाँ जुटते है
समय काटने को हम,फिर शॉपिंग करते है,
                           मंहगी है चीजें पर ,ख़ुशी  ख़ुशी  लुटते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, July 25, 2015

मैं तुम्हारा मीत रहूंगा

                मैं तुम्हारा मीत  रहूंगा

चाहे तुम मुझको अपना समझो ना समझो,
                पर जीवन भर ,मैं तुम्हारा मीत  रहूंगा
तुम बरबस ही अपने होठों से छू लगी ,
                मधुर मिलन का प्यारा प्यारा गीत रहूँगा
जिसकी सरगम दूर करेगी सारे गम को ,
               मैं मन मोहक,वही मधुर संगीत रहूँगा  
जिसकी कलकल में हरपल जीवन होता है,
               मै गंगा सा पावन  और पुनीत  रहूँगा
पहना तुमको हार गुलाबी वरमाला का ,
             मैं कैसे भी , ह्रदय तुम्हारा जीत रहूँगा
निज सुरभि से महका दूंगा तेरा जीवन ,
              सदा तुम्हारे दिल में बन कर प्रीत रहूँगा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

हम कितने पागल है

         हम कितने पागल है

बुढ़ापे में अपने को परेशान करते हैं 
बीते हुए जमाने को  याद करते हैं 
संयम से संभल संभल ,रहते  हरपल हैं  
सचमुच  हम कितने पागल हैं 
अरे बीते जमाने में क्या था ,
दिन भर की खटपट
गृहस्थी का झंझट
कमाई के लिए भागदौड़
आगे बढ़ने की होड़
उस जमाने में हमने जो भी जीवन जिया
अपने लिए कब जिया
सदा दूसरों के लिए जिया
इसलिए वो ज़माना औरों का था ,
हमारा ज़माना आज है
आज हमें किसी की परवाह  नहीं ,
घर में अपना राज है
एक दूसरे को अर्पित
पूर्ण रूप से समर्पित
हमारा प्यार करने का निराला अंदाज है
न किसी की चिता ,न किसी का डर
मौज मस्ती में  डूबे हुए,बेखबर
एक दुसरे का है सहारा
आज ही तो है,ज़माना हमारा
प्यार में डूबे हुए ,रहते हर पल है
फिर भी बीते जमाने को याद करते है,
सचमुच ,हम कितने पागल है
जवानी भर,मेहनत कर ,जमा की हुई पूँजी
अपने पर खर्च करने में,दिखाते कंजूसी
ऐसी आदत पड़  गयी है,पैसा बचाने की
अरे ये ही तो उमर है ,
अपना कमाया पैसा ,अपने पर खर्च करके ,
मौज और मस्ती मनाने की
क्योंकि अपने पर कंजूसी कर के ,
तुम जो ये पैसा बचा रहे है जिनके लिए 
वो तुम्हारे,क्रियाकर्म के बाद ,
आपस में झगड़ेंगे ,इसी पैसे के लिए
 तुम जिनकी चिंता कर रहे हो  ,
उन्हें आज भी तुम्हारी परवाह नहीं ,
तो तुम क्यों उनकी परवाह करते हो
उनके भविष्य के लिए बचा कर ,
क्यों अपना आज तबाह करते हो
तुम्हे उनके लिए जो करना था ,कर दिया,
आज वो अपने पैरों पर खड़े है
अपनी अपनी गृहस्थी में मस्त है
उनके पास ,तुम्हारे लिए कोई समय नहीं ,
वो इतने व्यस्त है
तो अपनी बचत,अपने ऊपर खर्च करो ,
खूब मस्ती में जियो ,
उनकी चिता मत व्यर्थ करो
मरने के बाद ,स्वर्ग जाने के लालच में ,
यहाँ पर नरक मत झेलो
अरे स्वर्ग के मजे यहीं है ,
खुल कर खाओ,पियो और खेलो
ये  बुढ़ापे की उमर ही ,
एक ऐसी उमर होती है ,
जब आदमी अपने लिए जीता है
बिना रोकटोक के ,अपनी ही मर्जी का ,
खाता और पीता है
क्या पता फिर ये ख़ुशी के पल ,हो न हो
क्या पता,कल,हो न हो
आदमी दुनिया में उतने दिन ही जीता है
जितना अन्न जल है
फिर भी हम परेशान रहते है,
सचमुच,हम कितने पागल है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

नफरत की दीवारें

        नफरत की दीवारें

तुम भी इन्सां ,हम भी इन्सां ,हम  में कोई फर्क नहीं है 
अलग अलग रस्तों पर चलते,आपस में संपर्क नहीं है 
सब है हाड मांस के पुतले ,एक सरीखे ,सुन्दर प्यारे
कोई हिन्दू ,कोई मुसलमां ,खड़ी बीच में क्यों दीवारें
ध रम ,दीन ,ईमान हमेशा,  फैलाता  है  भाईचारा
तो क्यों नाम धरम का लेकर ,आपस में होता बंटवारा
ठेकेदार धरम के है कुछ, जो है ये नफरत फैलाते
भाई भाई आपस में लड़वा ,है अपनी दूकान चलाते

घोटू

सड़ी गर्मी

      सड़ी गर्मी

जेठ की तपती धूप -कँवारापन
शादी--बारिशों का मौसम
शादी के बाद बीबी का मइके जाना -
विरह की आग में तपना ,आंसू बहाना
जैसे बारिश के बाद की सड़ी गर्मी -
उमस और पसीना आना

घोटू

गुलाब जामुन और रसगुल्ला

गुलाब जामुन और रसगुल्ला

जब रहा उबलता गरम दूध,उसने निज तरल रूप खोया
अग्नि ने इतना तपा दिया ,वो आज बंध  गया,बन खोया
वह खोया जब गोली स्वरूप ,था तला गया देशी घी  में
सुन्दर गुलाब सी  हुई देह , फिर डूबा गरम चाशनी में
वह नरम,गुलाबी और सुन्दर था गरम गरम सबको भाया
सबने जी भर कर लिया स्वाद ,गुलाब जामुन वो कहलाया
था दूध वही पर जब फाड़ा ,तो  रेशा  रेशा  बिखर गया
जब छाना ,पानी अलग हुआ ,वो छेना बन कर निखर गया
जब बनी गोलियां छेने की ,चीनी के रस में जब उबला
इतना डूबा वह उस रस में ,एक नया रूप लेकर निकला
वह श्वेत ,रस भरा ,स्पोंजी,जब प्लेटों में  मुस्काता है
स्वादिष्ट बहुत,मन को भाता,वह रसगुल्ला कहलाता है
रसगुल्ला और गुलाबजामुन ,ये दोनों भाई भाई  है
है  बेटे एक ही माता के  ,पर  अलग   सूरतें पायी है
है एक गुलाबी ,एक श्वेत ,एक गरम ,एक ठंडा  अच्छा
दोनों ही बड़े रसीले है, दोनों का स्वाद  बड़ा अच्छा
एक नरम मुलायम टूट जाए ,एक निचुड़ जाए पर ना टूटे
हर दावत और पार्टी में , दोनों ही वाही वाही  लूटे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

धरम का चक्कर

         धरम का चक्कर 

हमेशा जली कटी सुनाने वाली बहू ने ,
अपनी जुबान में मिश्री घोली
और अपनी सास से बड़े प्रेम से बोली
अपने शहर में आ रहे है ,
एक नामी गिरामी संत
जो करेंगे सात दिन तक,
भागवत कथा और सत्संग 
 सुना है उनके सत्संग में ,
भक्तिरस की गंगा बहती है
इसीलिये लाखों लोगों की,
भीड़  उमड़ती रहती है
अम्माजी,आप भी पुण्य कमालो,
ऐसा मौका बार बार नहीं आएगा
ड्राइवर सुबह आपको छोड़ आएगा ,
और शाम को ले आएगा
बहू के मुख से ,ये मधुर वचन सुन ,
सासूजी  हरषाई
सोचा ,थोड़ी देर से ही सही,
बहू को सदबुद्धि तो आई
इसी बहाने हो जाएगी थोड़ी ईश्वर की भक्ती
और कुछ रोज मिलेगी ,
गृहकलह और किचकिच से मुक्ती
सास ने हामी भर दी ,
तो बहू की बांछें खिल गयी
वो भी बड़ी खुश थी ,
सात दिन की पूरी आजादी मिल गयी
न कोई रोकने वाला,न कोई टोकने वाला,
हफ्ते भर की मौज मस्ती और बहार
इसे कहते है ,एक तीर से करना दो शिकार
सास भी खुश,बहू भी खुश ,
हर घर में ऐसी ही राजनीती चलती है
अब तो आप समझ ही गए होंगे ,
आजकल सत्संगों में और तीर्थों में
,इतनी भीड़ क्यों  उमड़ती है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

अब क्या करे भगवान ?

       अब क्या करे भगवान ?

सूरज तपा रहा था-बड़ी गर्मी थी
अब तो जल बरसा -भगवान से प्रार्थना की
बादल छाये -अच्छा लगा
ठंडी  हवा चली -अच्छा लगा
बारिश आयी -अच्छा लगा
दूसरे दिन भी बारिश आयी -अच्छा लगा
तीसरे दिन भी पानी बरसा-बोअर हो गए
चौथे दिन भी बारिश आयी -उकता  गए 
पांचवें दिन भी बारिश आयी -खीज आने लगी
छटवें दिन की बारिश से -परेशानी छाने लगी
सातवें दिन की बारिश पर -भगवान से प्रार्थना की
अब तो बहुत हो गया-रोक दे ये झड़ी
अजीब है -हम इंसान
वो नहीं देता -तो भी  परेशान
वो देता है-तो भी परेशान
अब क्या करे भगवान ?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

करलें थोड़ा आराम प्रिये !

          करलें थोड़ा आराम प्रिये !

अब नहीं रहे दिन यौवन के ,उड़ते थे आसमान में जब
फिर काम काज में फंसे रहे ,फुर्सत मिल ही पाती थी कब
था बचा कोई रोमांच नहीं ,बन गया प्यार था नित्यकर्म
हम रहे निभाते पति पत्नी ,बन कर अपना ग्राहस्थ्य धर्म
दुनियादारी के चक्कर में ,हम रहे व्यस्त,कर भागदौड़
अब आया दौर उमर का ये,हम तुम दोनों हो गए प्रौढ़ 
आया ढलान पर है यौवन ,अब वो वाला उत्थान नहीं
ना कह सकता तुमको बुढ़िया,पर अब तुम रही जवान नहीं
 धीरे धीरे  हो रहा शांत  , वो यौवन  का तूफ़ान प्रिये
अब उमर ढल रही है अपनी ,करलें थोड़ा आराम प्रिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

इत्ती सी बात

           इत्ती सी बात

पंडित और मौलवी ने ,अपनी बसर चलाने
लोगों को कर दिये बस,सपने यूं ही दिखाने
दो दान तुम यहाँ पर,जन्नत तुम्हे मिलेगी
हूरें और अप्सराएं, खिदमत  वहां  करेगी
जन्नत की हक़ीक़त को ,कोई न जानता है
मरने के बाद क्या है,किसको भला पता है
सब खेल सोच का है,मानो जो तुम अगर ये
दुनिया बहिश्त है ये,देखो जो उस नज़र से
हर रोज ईद समझो,हर दिन दिवाली मानो
बरसेगी रोज खुशियां ,जन्नत यहीं ये जानो
इत्ती सी हक़ीक़त तुम,लेकिन जरूर समझो
घर ही लगेगा जन्नत,बीबी को हूर समझो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, July 17, 2015

    कंधे से कन्धा मिला कर काम करो

 नेता बार बार यह कहते है ,
कि यदि देश के नर और नारी
अगर कंधे से कन्धा मिलाकर काम करे,
तो निश्चित ही होगी प्रगति हमारी
मैंने  उनसे प्रेरित होकर ,
राह  में जाती एक युवती से कन्धा मिलाया
तो प्रगति तो नहीं,मेरी दुर्गती हो गयी,
जब उसने मुझ पर अपना सेंडिल उठाया
मैं भागा और अबकी बार ,
एक लड़के के जाकर मिलाया कन्धा
वो बोला ,अबे क्या तू है अँधा
मैं बोला चलो ,
कंधे से कन्धा मिला कर काम करते है 
वो बोला किसी और को ढूंढो ,
हम छोटी लाइन पर नहीं चलते है
फिर मैंने सोचा ,छोडो ये चक्कर
काम करने के लिए पहुँच गया दफ्तर
वहां ,अपने एक सहकर्मी के साथ,
बैठ  गया , कन्धा मिला कर
और बोला की अब हम ऐसे ही ,
कंधे से कन्धा मिला कर ,काम करेंगे
वो बोला  सीधे सीधे क्यों ना कहते ,
न खुद काम करेंगे  ,न तुमको करने देंगे
बॉस  ने  देखा तो बोला ये चिढ
क्यों लगा रखी है ,यहाँ पर ये भीड़
गुस्से में आकर ,बोला झल्ला कर
काम करो अपनी अपनी सीटों पर जाकर
कहीं पर भी जब हम ,कर कुछ न पाये
तो सोचा कि घर पर ही ये नुस्खा आजमाये
हमने पत्नीजी से बोला कि अगर ,
प्रगति की ओर हमें होना है अग्रसर
तो  काम करना होगा,कंधे से कन्धा मिलाकर
 इसलिए मुझे अपने कंधे से कन्धा मिलाने दो
पत्नी बोली ,बड़े रोमांटिक मूड में लग रहे हो,
थोड़ी देर रुको,बच्चों को सो जाने दो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

नारी जीवन

            नारी जीवन

                                       कितना मुश्किल नारी जीवन
उसे बना कर रखना पड़ता,जीवन भर ,हर तरफ संतुलन
                                       कितना मुश्किल नारी जीवन
जिनने जन्म दिया और पाला ,जिनके साथ बिताया  बचपन
उन्हें त्यागना पड़ता एक दिन,जब परिणय का बंधता बंधन 
माता,पिता,भाई बहनो की , यादें  आकर  बहुत  सताए
एक पराया , बनता  अपना , अपने बनते ,सभी  पराये
नयी जगह में,नए लोग संग,करना पड़ता ,जीवन व्यापन
                                       कितना मुश्किल नारी जीवन
कुछ ससुराल और कुछ पीहर ,आधी आधी वो बंट  जाती
नयी तरह से जीवन जीने में कितनी ही दिक्कत   आती
कभी पतिजी  बात  न माने , कभी  सास देती है ताने
कुछ न  सिखाया तेरी माँ ने ,तरह तरह के मिले उलाहने
कभी प्रफुल्लित होता है मन, और कभी करता है क्रंदन 
                                     कितना मुश्किल नारी जीवन
इसी तरह की  उहापोह में ,थोड़े  दिन पड़ता  है  तपना
फिर जब बच्चे हो जाते तो,सब कुछ  लगने लगता अपना
बन कर फिर ममता की मूरत,करती है बच्चों का पालन
कभी उर्वशी ,रम्भा बन कर,रखना पड़ता पति का भी मन
 किस की सुने,ना सुने किसकी ,बढ़ती ही जाती है उलझन    
                                        कितना मुश्किल नारी जीवन
बेटा ब्याह, बहू जब आती  ,पड़े सास का फर्ज निभाना
तो फिर, बेटी और बहू में ,मुश्किल बड़ा ,संतुलन लाना
बेटा अगर ख्याल रखता तो, जाली कटी है बहू सुनाती
पोता ,पोती में मन उलझा ,चुप रहती है और गम खाती
यूं ही बुढ़ापा काट जाता है  ,पढ़ते गीता और  रामायण
                                 कितना मुश्किल नारी जीवन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, July 15, 2015

         मैं रहा छीलता घांस प्रिये 

मैं तो यूं ही सारा जीवन,बस रहा छीलता घांस प्रिये 
शायद तुमने खाई होगी ,तुम ही थी मेरे पास  प्रिये
                                       मैं हूँ तुम्हारा  दास   प्रिये 
वो घांस भैंस यदि खा लेती ,तो देती दूध ढेर सारा ,
तुम हुई भैस जैसी मोटी ,चढ़ गया बदन पर मांस प्रिये 
                                      मुझ पर करलो विश्वास प्रिये 
तुम्हारी काया कृष्ण वर्ण ,इस तरह फूल कर फैलेगी ,
मैं तुम्हे डाइटिंग करवाता ,यदि होता ये आभास प्रिये 
                                       तुम तो मेरी ख़ास प्रिये 
तुम स्विमिंग पूल मे मत जाना,मारेंगे लोग मुझे ताना ,
लो गयी भैंस पानी में कह,मेरा होगा  उपहास  प्रिये 
                                     आये  ना मुझको रास प्रिये 
 आधे से ज्यादा डबलबेड ,पर तुम कब्जा कर सोती हो,
उस पर तुम्हारे खर्राटे ,   देतें है मुझको   त्रास  प्रिये 
                                       मैं  आ ना पाता पास प्रिये 
 मैं क्षीणकाय ,दुबला पतला ,तुम राहु केतु सी छा जाती,
मैं होता लुप्त  ग्रहण मुझ पर ,लग जाता है खग्रास प्रिये 
                                          मैं ले ना पाता सांस  प्रिये 
तुम्हारा खाने पर ना बस ,तुम्हारे आगे मैं  बेबस ,
तुमने अपने संग मेरा भी ,कर डाला सत्यानाश प्रिये 
                                        फिर भी  जीने की आस प्रिये 
 
  मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कान्हा की मुश्किल

          कान्हा की मुश्किल

नहीं वृन्दावन तुम,हो  आते कन्हैया
न लीलायें अपनी  ,दिखाते कन्हैया
सुनी बात ये तो ,कहा ये किशन ने
बहुत कुछ गया अब ,बदल वृन्दावन में
कभी हम चराते थे गायें जहाँ पर
नयी बस्तियां ,बस गयी है वहां पर
नहीं गोपियाँ जा के ,जमुना नहाये 
भला उनके कैसे वसन हम चुराएं
सभी के घरों में ,बने स्नानघर  है
नहा कर वहीं से ,निकलती ,संवर है
सुना करती दिन भर है वो फ़िल्मी गाने
उन्हें क्या लुभाएगी ,मुरली की ताने
घरों में अब मख्खन ,बिलौते नहीं है
चुराऊं क्या, ना दूध है  ना  दही  है 
मैं  जमुना नहाऊँ ,बहुत आता जी में
मगर है प्रदूषण ,बड़ा जमुना जी में
कई कालियानाग,वमन विष का करते
 हुई जमुना मैली,इन्ही की वजह से 
पुलिस से शिकायत ,करेगा जो कोई
दफा,हर दफा वो लगा देंगे  ,कोई
चुराऊं जो माखन,अगर घर में घुस कर
दफा वो लगा देंगे ,तीन सौ अठहत्तर
फोडूं जो मटकी ,अगर मार  कंकर
दफा पांच सौ नो में ,कर देंगे अंदर
अगर गोपियों के ,चुराउंगा  कपडे
तीन सो चोपन में ,वो मुझको पकडे
मै बोला डरो मत,कन्हैया तुम इतने
पुलिस और दारोगा,सभी भाई अपने
तुम्हारे लिए माफ़ ,हर एक खता है
यदुवंशियों का ही  शासन  यहाँ  है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू' 

स्वच्छता अभियान

        स्वच्छता अभियान

स्वच्छता अभियान अच्छी बात है
गली,गाँव ,सबको  रखना  साफ़ है
पर सफाई ये सिरफ़ ,काफी नहीं
कहीं पर भी गंदगी  ,भाती  नहीं
राजनीति स्वच्छ होनी चाहिए
नीतियां ,स्पष्ट   होनी    चाहिए
पारदर्शक ,दफ्तरों में काम हो
काम करवाना जहाँ आसान हो
स्वच्छता हो ,आचरण ,व्यवहार में
काम सारे निपट जाएँ,प्यार  में
नहीं मन में मैल होना चाहिए
और सभी में मेल होना चाहिए
नहा धोकर ,साफ़ तुम करलो बदन
कितने ही उजले ,धुले पहनो वसन
पर न मन में पाप होना चाहिए
दिल तुम्हारा साफ़ होना चाहिए

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, July 13, 2015

बंधन का सुख

           बंधन का सुख

आवश्यक जीवन में बंधन ,बंधन  रहता  अनुशासन
उच्श्रृंखलता बांध जाती है ,जब बंधता शादी का बंधन
बिखरे रहते है अस्त व्यस्त ,पर खुले बाल जब बंधते है
नागिन सी चोटी बन कर ये,कितने ही  दिल को डसते है
जब तक कंचुकी की डोर बंधी, तब तक उन्नत,यौवन उभार
जो  खुली डोर ,स्वच्छंद हुए ,तो नज़र आएंगे ये  निढाल
यदि नहीं रहे जो बंधन में ,ये कलश ढलक फिर जाते है
बंधन है  तब ही तने हुए ,ये  सबके  मन  को  भाते है
कितना ज्यादा सुख देता है ,जब बंधता बाँहों का बंधन
तुम्हारी लाज  बचा कर के , रखता तुम्हारा कटिबंधन
आवारा बादल के जैसे ,  हर कहीं बरसना ठीक नहीं
बंधन में ही सच्चा सुख है ,स्वच्छंद विचरना ठीक नहीं

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'


प्रभु की रचना -नारी

         प्रभु की रचना -नारी

प्रभु तेरी रचना यह नारी,कितनी अद्भुत,कितनी सुन्दर
सर पर बादल के दल के दल ,मुस्कान गुलाबी गालों पर
चन्दा से चेहरे पर शोभित, दो नयन,मीन से,मतवाले
मोती सी प्यारी दन्त लड़ी,दो अधर ,भरे रस के प्याले
पीछे है भार नितम्बों का,आगे यौवन का भरा भार
इसलिए संतुलित रहता तन,ना कमर लचकती बार बार
वरना इतनी कमनीय कमर ,ना जाने कितने बल खाती
मतवाली चाल देख कर के,कितनी ही नज़र फिसल जाती
नारी तन पर दे युगल कलश ,पहले उन्माद  भरा उनमे
फिर जब मातृत्व जगाया तो,ममता का स्वाद भरा उनमे
नाजुक गोरा तन टिका हुआ ,कदली के दो स्तम्भों पर
कितना महान वह रचयिता ,जिसकी रचना इतनी सुन्दर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'