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Friday, February 12, 2016

पिचत्तरवें जन्मदिवस पर

   पिचत्तरवें जन्मदिवस पर

वर्ष  चौहत्तर  ऐसे  काटे
मैंने सबके सुखदुख बांटे
कुछ मित्र मिले थे अनजाने
कुछ अपने, निकले बेगाने
कोई से मन के मिले तार
कोई अपनो की पडी मार
जब थका  किसी ने दुलराया
कोई ने ढाढ़स  बंधवाया
कोई ने कर तारिफ़ जब तब
साधे अपने अपने  मतलब
कोई ने खोटी खरी  कही
मैंने हंस कर हर बात सही
कुछ रिश्तेदारी,कुछ रस्मे
कुछ झूंठे वादे ,कुछ कसमे
कुछ आलोचक तो कुछ तटस्थ
बस,यूं ही सबने रखा व्यस्त
माँ ने ममता का निर्झर बन
बरसाई आशीषें ,हर क्षण
थे प्यार लुटाते ,भाई बहन
तो दिया पिता ने अनुशासन
सहचरी ,सौम्या मिली प्रिया
जिसने हर पल पल साथ दिया
अपने में खुश सन्तान पक्ष
इच्छित सबको मिल गया लक्ष
है  आशीर्वाद साथ  माँ का
और मित्रों की शुभ आकांक्षा
ये ही मेरी संचित पूँजी
इससे बढ़ दौलत ना दूजी
जीवन गाडी, कट रहा सफ़र
चूं चरर मरर ,चूं चरर मरर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'


Monday, February 8, 2016

आहट


घने कोहरे में बादलों की आहट
तैरती यादों को बरसा रही है
देखो महसूस करो
किसी अपने के होने को
तो आहटें संवाद करेंगी
फिर ये मौन टूटेगा ही
जब धरती भीग जायेगी
तब ये बारिश नहीं कहलायेगी
तब मुझे ये तुम्हारी आहटों की संरचना सी प्रतीत होगी
और मेरा मौन आहटों में
मुखरित हो जायेगा।

© दीप्ति शर्मा

Sunday, February 7, 2016

पुनर्वावलोकन -अब तक की जिंदगी का

     पुनर्वावलोकन  -अब तक की जिंदगी का 

१९४२ में,जब मैं पैदा हुआ था,
अंग्रेजों भारत छोडो का नारा गूँज रहा था
और जब मैं पांच वर्ष का हुआ और
मैंने बचपना और जिद करना छोड़ दिया ,
अंग्रेजों ने भारत छोड़ दिया
पर फिर कुछ ऐसा हुआ ,
कि देश के लोगों की जीवन पद्धति ने
एक नया मोड़ लिया
पुरानी मान्यताएं बदलने लगी
संस्कृति सिसकने लगी
पश्चिम की हवाओं ने वातावरण को
दूषित कर डाला
हमारी सोच को कलुषित कर डाला
पहले भले ही हम आजाद नहीं थे,
व्यवस्थाएं अनुशासित रही थी
रोज रोज के आंदोलन और हड़तालों से,
ग्रसित नहीं थी
आज कोंक्रीट के उगे हुए जंगलों को जब देखता हूँ,
तो याद आती है वो हरियाली ,
वो हरेभरे वृक्ष जो शीतल हवाएँ बरसाते थे
वातावरण को खुशनुमा बनाते थे
जब बोतलों में बिकता हुआ पानी देखता हूँ ,
तो कुवें से निकाला गया वो ताज़ा  जल याद आता है ,
जो कपडे से छन कर स्वच्छ हो जाता था
मिट्टी के घड़ों में संचयित कर ,
दिन भर पिया और पिलाया जाता था
अरे उन दिनों मटके रखने की जगह ,
'पिरण्डे ' को भी पूजा जाता था
लोग गर्मियों में प्याऊ लगवा कर ,
मुफ्त प्यासों की प्यास बुझा कर पुण्य कमाते थे
बढे हुए प्रदूषण को देख कर ,
याद आते है बचपन के वो दिन
जब आसमान का नीला रंग ,
स्पष्ट दमकता था
और आकाश में उगते हुए तारों को,
एक एक कर गिना जा सकता था
बिजली के प्रकाश से उज्ज्वलित
सड़के और घरों को देख कर याद आती है
उन टिमटिमाते दियों  और लालटेनों की ,
जो अँधियारे घरों को ,प्रकाशमान करते थे
और सर्दियों में ,पूरे परिवार के लोग,
अंगीठी के आसपास बैठ,
मूंगफलियां खाया करते थे
मुझे याद आते है वो दिन ,
जब खाना बनाते वक़्त ,
माँ,पहली रोटी गाय के लिए बनाती थी
और बचे खुचे आटे से,
कुत्ते की रोटी बनाई जाती थी
बासी खाना खाया  नहीं जाता था
और रसोईघर को रोज धोया जाता था
मुझे वो बीते हुए दिन बहुत सताते  है
जब आज हम ,
गायकुत्ते की तो छोडो ,खुद भी ,
तीन चार दिन पुराने ओसने हुए,
फ्रिज में रखे हुए  आटे की ,
रोटियां खाते है
आज,नन्हे नन्हे बच्चों को ,
अपने झुके हुए कन्धों पर ,
भारी भारी बस्ता लादे  देख कर
अपने स्कूल के दिन याद आते है
भले ही हम टाटपट्टी पर बैठ कर पढ़ते थे ,
हमारे बस्ते हलके होते थे
और बच्चों या उनके मातापिताओं पर
होमवर्क का कोई बोझ नहीं पड़ता  था
और बचपन हँसते , खेलते मस्ती में कटता था
समझ में नहीं आता ,
इतना बदलाव कैसे आ गया है
हम बदल गए है
हमारी मानसिकता बदल गयी है
प्रकृती बदल गयी है
जीवन की धारणाएं बदल गयी है
हम भावनाओं  के बंधन से उन्मुक्त होकर ,
ज्यादा व्यवाहरिक होते जा रहे है
संयुक्त परिवार टूटते जा रहे है
हमारी आस्थाएं दम तोड़ रही है
हम दो और हमारे दो के कल्चर ने ,
सारे रिश्ते और नातों को भुला दिया है
कहने को तो हमने बहुत प्रगति करली है,
पर इस प्रगति ने हमे रुला दिया है
पिछले चौहत्तर वर्षों में ,
मैंने दुनिया को इस तरह बदलते देखा है
कि मेरे काले बाल तो सफ़ेद हो गए ,
पर दुनिया ,जो कभी सफेद थी,
काली होती जा रही है
और  ये ही बात मुझे बहुत सता रही है 
शुभम भवतु

मदन मोहन बाहेती 'घोट

रंगीन मिज़ाजी

      रंगीन मिज़ाजी

दिन भर तपने वाला सूरज भी,
रोज शाम जब ढलता है ,
रंगीन मिज़ाज़ हो जाता है
और बदलियों के आँचल पर ,
तरह तरह के रंग बिखराता है
तो क्यों न हम,
अपने जीवन की,
 ढलती उम्र के सांध्यकाल में
रंगीनियाँ लाये
जाते जाते  जीवन का ,
पूरा आनंद उठायें
अंततः रात तो आनी  ही है

घोटू

Thursday, February 4, 2016

एक कौवे की कथा-एक गगरी की व्यथा

    एक कौवे की कथा-एक गगरी की व्यथा

मैं थी थोड़ी  भरी हुई सी ,मटकी,अपनी  छत पर
दिल्ली की भोली जनता सी,तुम आये झट उड़ कर
सीधी सी  टोपी  पहने , गुलबंद गले में   टांगा
मैं समझी भोला ,तुम निकले ,बड़े मतलबी कागा
सुख के सपने ,आश्वासन की ,कंकरी मुझ में डाली
मेरा पानी ऊपर आया ,तुमने प्यास   बुझाली
सोचा था अपनाओगे पर तुम सत्ता के भूखे
मेरा हाल कभी ना पूछा ,रो रो आंसू   सूखे
खांस खांस कर दिल्ली का पॉल्यूशन स्वयं बढ़ाया
और 'आड 'ईवन 'के चक्कर में जनता को उलझाया
रोज रोज झगड़े  करते,अपनी दूकान  चलाते
 मुझको कचरे से मैला कर ,बेंगलूर भग जाते
तुम झूंठे,तुम्हारे वादे और सब बातें झूंठी
भोग रहे सत्ता का सुख तुम ,मुझ को करके जूंठी
आम आदमी का रस चूंसा ,और नहीं फिर सुध ली
बची सिरफ़ छिलके सी टोपी,और तुम निकले गुठली

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, February 2, 2016

अपनी दिल्ली छोड़ कर

           अपनी दिल्ली छोड़ कर

अपना मफलर ,अपनी टोपी ,अपनी दिल्ली छोड़ कर
भाग रहे बंगलूर को हो ,इलाज कराने दौड़ कर
' आड 'और 'ईवन 'चक्कर में ,दिल्ली की जनता को सता
सड़कों पर फैला कर ढेरों ,कूड़ा ,करकट , रायता
पोलल्युशन को बढ़ा गए हो ,तुम अपना मुख मोड़ कर
अपना मफलर ,अपनी टोपी,अपनी दिल्ली छोड़ कर
मुश्किल से तुम भाग रहे हो ,यह तुम्हारा  ढोंग है
खांसी का इलाज है अदरक  और शहद है,लोंग है
हाल ठीक करते हो अपना और दिल्ली बदहाल है
नहीं दूध के धुले हुए तुम,क्या ये कोई चाल है
और ठीकरा इस सबका ,औरों के सर पर फोड़ कर
भाग रहे तुम बेंगलूर ,इलाज कराने  दौड़ कर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

तुम बेगाने हो जाओगे

 तुम बेगाने हो जाओगे
 
कोई बेगाने को इतना  अपनाओगे
कि अपनों से ,तुम बेगाने हो जाओगे
नौ महीने तक रखा कोख में ,पाला पोसा
सच्चे मन से ,तुमको अपना प्यार परोसा
उस माँ का भी तोड़ दिया दिल और भरोसा
बुरा भला कह ,उसको ही करते हो कोसा
बेटे ,सपने में भी कभी नहीं सोचा था ,
ऐसे हो जाओगे, इतने बदल जाओगे
कि अपनों से तूम बेगाने हो जाओगे
इतने वर्षों तक तुमको प्यारी लगती थी
वो माँ जो तुमको सबसे न्यारी लगती थी
चार दिनों ,पत्नी सुख पा,इतने पगलाए
उससे अच्छी कोई तुम्हे नज़र ना आये
प्यार सभी ही करते है अपनी पत्नी से ,
लेकिन तुम इतने दीवाने हो जाओगे
कि अपनों से तुम बेगाने हो जाओगे
अपने सारे भाई बहन का प्यार भुलाया
किया पिता ने इतना सब उपकार भुलाया
पढ़ा लिखा कर तुम्हे बनाया जिसने लायक
आज उन्ही की बातें लगती तुमको बक बक
मैं और मेरी मुनिया में सीमित कर दुनिया ,
शादी कर तुम इतने स्याने हो जाओगे
कि अपनों से तुम बेगाने हो जाओगे

मदन मोहन बाहेती;घोटू' 

सर्दी के रंग

       सर्दी के रंग

कोहरे से धुंधलाया ,आसमान नीला सा
सूरज का रंग भी ,पड़  गया पीला सा
गुलाबी गुलाबी सी ,सर्दियाँ पड़ने लगी
वृक्षों की हरियाली ,थोड़ी उजड़ने लगी
अलाव की लाल लाल,लपटों ने सहलाया
श्वेत बर्फ चादर ने ,सर्दी से सिहराया
सूरज के ढलने पर नारंगी हुई साँझ
रात रजाई में दुबकी,काला सा काजल आंझ
बैगनी 'प्यार घाव',सवेरे नज़र आये
सर्दी ने, देखो तो, सभी रंग बिखराये

घोटू 

कितने दिन जीवन बाकी है

           कितने दिन जीवन बाकी है

नहीं पता यह मौत किसी को कब आ जाए ,
        नहीं पता यह कितने दिन जीवन बाकी है
नहीं किसी को कभी पता यह लग पाता है,
       कितने दिन तक ,साँसों की सरगम बाकी है
फिर भी उलझे बैठें है दुनियादारी मे ,
       परेशान है ,सोच रहे है कल ,परसों की
है कितनी अजीब फितरत इन्सां की देखो,
      कल का नहीं भरोसा ,बात करे बरसों की
मोहजाल में फंसे हुए,माया में उलझे ,
      जाने क्या क्या ,लिए लालसा भटक रहे है
अपनी सभी कमाई धन दौलत ,वैभव में ,
     रह रह कर के ,प्राण हमारे अटक रहे है
धीरे धीरे ,क्षीण हो रही ,जर्जर काया ,
      कई व्याधियों ने घेरा है, तन पीड़ित है
साथ समय के ,बदल रहा व्यवहार सभी का ,
       अपनों के बेगानेपन से मन पीड़ित है
ना ढंग से कुछ खा पाते ना पी पाते है ,
      फिर भी मन में चाह ,और हम जी ले थोड़ा
नज़र क्षीण है,याददास्त कमजोर पड़  गयी,
      लोभ मोह ने पर अब तक पीछा ना छोड़ा
पता नहीं यह मानव मन की क्या प्रकृती है,
     कृत्तिम साँसे लेकर कब तक चल  पायेगा
जिस दिन तन से उड़ जाएंगे प्राणपंखेरू ,
     हाड़मांस का पिंजरे है तन  ,जल जाएगा
तो क्यों ना जितने दिन शेष बचा है जीवन ,
     उसके एक एक पल का,जम कर लाभ उठायें
हंसी ख़ुशी से जिए ,तृप्त कर निज तन मन को,
    जितना भी हो सकता ,सब में ,प्यार लुटाएं     
सभी जानते,दुनिया में,यह सत्य अटल है,
    माटी में ही माटी का संगम बाकी है
नहीं पता यह मौत किसी को कब आ जाए,
   नहीं पता यह कितने दिन जीवन बाकी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मिडिया -तूने क्या क्या किया

     मिडिया -तूने क्या क्या किया

हम सुनते है ,तुम सुनते हो,सब सुनते है ,
        तरह तरह की खबर रोज टी वी देता है
हरेक  खबर की निश्चित एक उमर होती है,
        किन्तु मिडिया उसको लम्बी कर देता है
बलात्कार ,अपहरण और मर्डर की खबरें,
       तरह तरह की रोज रोज कितनी आती है
इतना ज्यादा उन्हें उछाला पर जाता है,
      जिससे कई जरूरी खबरें  दब जाती है
कितनी न्यूज़ चेनले चलती चौबीस घंटे ,
     कितनी बार ,कहाँ से नयी खबर लाएगी
पर चौबीस घंटे कुछ ना कुछ करना ही है,
      तो फिर वो खबरों पर चर्चा  करवाएगी
कुछ जाने पहचाने नामी,चर्चित चेहरे ,
      ऐसी चर्चाओं में रोज नज़र  आते है 
 सारे के सारे बढ़ बढ़ बातें करते है ,
      एक दूसरे को गाली दे,चिल्लाते  है
  क्रिकेट  मैच जीतते ,वाह वाह होती है ,
      और हार जाते ,केप्टिन गाली खाता है
कोई चैनल सदा किसी का आलोचक है ,
      कोई चैनल ,सदा किसी के गुण गाता है
कभी दादरी वाला केस उछल जाता है ,
      कभी मालदा वाली घटना  दब जाती है
हर एक खबर के पीछे कोई भेद छुपा है,
      और कुछ खबरे दावानल सी बन जाती है
चंद्रग्रहण पर,सूर्यग्रहण पर ,घंटों घंटों ,
     ज्योतिषियों का पेनल मिल करता है चर्चा
करवा लाइव टेलीकास्ट कथा का वाचक,
         पॉपुलर बनने को करते कितना खर्चा
राजनीति की उठापटक में माहिर टी वी,
       कभी कभी सत्ताएं भी पलटा करता है
कभी किसी को बहुत उठता,बहुत गिराता ,
      सत्ता ही क्या,हर विपक्ष उससे डरता है
हुई किसी की मौत चार दिन चर्चा होती,
       बरसों बाद उखड़ते मुर्दे  गढ़े हुए है
चार दिनों में मिले  जमानत कोई को तो,
      कोई सालों यूं ही जेल में पड़े हुए है
ग्रह बदले ना बदले ,टीवी जब रुख बदले ,
      कितनो का ही भाग्य  बदल लेकिन जाता है
कोई पार्टी सत्ता से च्युत हो जाती है ,
    और किसी के हाथों में पावर  आता है
खेल मिडिया का है या फिर है पैसों का,
     कुछ भी हो,दोनों के दोनों पावरफुल है
देख मिडिया पर्सन,माइक और कैमरा ,
     अच्छे अच्छों की हो जाती बत्ती गुल है
कोई फेंकता नेता पर चप्पल या श्याही,
    पब्लिसिटी ,अच्छी खासी, पा लेता है
हरेक खबर की निश्चित एक उमर होती है,
     मगर मिडिया उसको लम्बी कर देता है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

काटा काटी

         काटा काटी

मार काट से क्यों है ये  दुनिया  घबराती
जबकि कितनी काट ,काम में काफी आती
नाइ काटे बाल ,आदमी संवर जाएगा
दरजी काटे वस्त्र ,नया फैशन आएगा
माली काटे फूल पत्तियां,निखरे गार्डन
नेता काटे रिबिन, उसे कहते  उदघाटन
जेब किसी की कटती है वो लुट जाता है
रोज रोज किट किट से झगड़ा बढ़ जाता है
मंत्री जी वो जबसे बने ,कट रही चांदी
धन दौलत और शोहरत होती पद की बांदी
ओहदे वाले अफसर  ,काटे रोज  मलाई
कटता सदा  गरीब ,मगर  है यही सचाई
खरबूजे पर चाकू, चाकू पर खरबूजा
गिरे कोई भी,कटता  बेचारा खरबूजा
काटा काटी ने है बिगड़ा काम सुधारा
जब ना खुलती गाँठ,काटना पड़ता नाडा
नींद न आती जब रातों को काटे मच्छर
कोई ज्यादा उड़े ,काट दो तुम उसके पर
दे दो ज्यादा ढील,पतंगे कट जाती है
थोड़े बनो दबंग, मुसीबत  हट जाती है 
कुछ होते इतने जहरीले ,क्या बतलाये
जिनका काटा ,पानी तक भी मांग न पाये
मुश्किल के दिन,मुश्किल से ही कट पाते है
अपने से मत कटो, काम वो ही आते  है
कभी किसी की बात न काटो,चिढ जाएगा
बिना बात के झगड़ा करके  भिड़   जाएगा
अपना पेट काट कर ,जिन बच्चो को पाला
बुढ़ापे में ,घर से उनने , हमें  निकाला 
यूं ही किट किट में मत उलझाओ निज मन
जितना जीवन बचा ,काट दो,कर हरिस्मरण

घोटू

दाद

दाद

जो आता है मेरे मन में ,उसे ढाल कर के लफ्जों में ,
अपनी बात ग़ज़ल कह कर के ,सदा सुनाया करता हूँ
जिन्हे बात मेरी जमती है,जम कर दाद मुझे देते है ,
मगर दाद जो तुमने दी है , सदा  खुजाया करता  हूँ

घोटू

मेरा गाँव-मेरा देश

        मेरा गाँव-मेरा देश

मेरे गाँव के हर आँगन में ,बिरवा है तुलसीजी का ,
    गली गली में मीरा जी के ,देते भजन सुनाई है
हर घर एक शिवालय सा है,हर दिवार पर राम बसे ,
    कान्हा की बंसी बजती ,रामायण की चौपाई है
मंदिर से घण्टाध्वनि आती ,भजन कीर्तन होता है,
    ताल मंजीरे ,ढोलक के स्वर ,सदा गूंजते रहते है
जहां गंगा की एक डुबकी में पुण्य कमाया जाता है,
    जहां गाय को गौमाता कह  लोग पूजते रहते है
जहां पीपल ,वट वृक्ष,आंवला ,का भी पूजन होता है,
   रस्ते के पत्थर भी पूजे जाते कह  कर पथवारी
अग्नि की पूजा होती है ,दीप  वंदना  होती है ,
   हवन यज्ञ में आहुति दे ,पुण्य कमाते है भारी
गंगा जमुना का उदगम भी ,तीर्थ हमारा होता है,
  गंगाजल लोटे में भर कर ,उसकी पूजा की जाती
हम पत्थर की मूरत  में भी ,प्राण प्रतिष्ठा करते है,
   सात अगन के फेरे लेकर ,बनते है जीवनसाथी
हम सीधे सादे भोले है ,मगर आस्था इतनी है,
    उगते और ढलते सूरज को अर्घ्य चढ़ाया जाता है
जहाँ औरतें व्रत करती है, पति को लम्बी उम्र मिले,
   चन्द्रदेव के दर्शन कर के भोजन खाया   जाता है
श्राद्धपक्ष में सोलह दिन तक ,तर्पण करते पुरखों का,
   श्रद्धा से सर उन्हें नमाते ,हम उनके आभारी है
धर्म सनातन,बहुत पुरातन ,धन्य धन्य यह संस्कृती है,
   हम भारत के वासी ,भारतमाता  हमको प्यारी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
   

Monday, February 1, 2016

आज
बहुत दिनों बाद
धूप की तीखी चुभन
मन को लुभा गई
ऐसा लगा
जुदाई  के दिन  बीत गये
पत्नी मैके से आ गयी
घोटू

Tuesday, January 26, 2016

परिंदे

                    परिंदे

वो परिंदे ,राजपथ पर ,उड़ते थे जो शान से ,
आजकल मेरी गली में ,नज़र वो आने लगे  है
चुगा करते थे कभी जो ,चुन चुन के ,मोती सिरफ़ ,
कुछ भी दाना फेंक दो ,वो बेझिझक खाने लगे है 
सुना है कि कोई जलसा ,होने वाला है वहां ,
सुरक्षा की व्यवस्थाएं ,चाक और चौबंद  है
हर तरफ से ,हर किसी पर रखी जाती है नज़र,
इसलिए उनका वहां पर ,हुआ उड़ना बंद है
ये भी हो सकता है या फिर 'इलेक्शन 'हो आ रहा ,
करो जन संपर्क तुम,ऐसा मिला  आदेश हो
'ख़ास' से वो 'आम'बन कर ,चाहते हो दिखाना ,
इसी चक्कर में बदल  ,उनने  लिया निज भेष हो
बने खबरों में रहें ,टी वी में  और  अखबार  में ,
कहीं भी ,कुछ हादसा हो ,दौड़ कर  जाने  लगे है
मगर उनकी असलियत सबकी समझ में आ गयी ,
जो कि पिछले कई वर्षों से, गए  उनसे ठगे  है 
फिर भी देखो ,हर तरफ ,हर गली में ,हर गाँव में,
जिधर देखो ,उस तरफ ,वो आज मंडराने  लगे है
 वो परिंदे,राजपथ पर ,उड़ते थे ,जो शान से ,
आजकल मेरी गली में ,नज़र वो आने  लगे  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

माँ की पीड़ा

                      माँ की पीड़ा              

बेटे ,जब तू रहा कोख में ,बहुत सताया करता था
मुझको अच्छा लगता था जब लात चलाया करता था
और बाद में ,लेट पालने में,जब भरता  किलकारी
जैसे साईकिल चला रहा ,लगती थी ये हरकत प्यारी
या फिर मेरी गोदी में चढ़,जब जिद्दी पर आता था
बहुत मचलता था ,रह रह कर,मुझ पर लात चलाता था
सोते सोते ,लात चलाने की, भी  थी ,आदत तेरी
बार बार तू ,हटा रजाई , कर देता  आफत   मेरी
तेरी बाल सुलभ क्रीड़ाएं, बहुत मोहती थी जो मन
नहीं पता था ,एक दिन ऐसे ,उभरेगी वो आफत बन
कभी न सोचा ,लात मारना ,ऐसा   रंग  दिखायेगा
लात मार कर ,अपने घर से ,एक दिन मुझे भगायेगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'



अपहरण

                           अपहरण

मैंने थाने में लिखाई  ये रपट , चार  दिन से  हुआ सूरज  लापता
दरोगा ने मुझसे ये दरयाफ्त की ,अकेला या गया कुछ लेकर, बता
मैंने बोला' क्या बताऊँ तभी से ,'धूप 'भी गायब है,मन में क्लेश है
दरोगा बोले,नहीं गुमशुदाई ,अपहरण का ये तो लगता  केस  है
अच्छा ये बतला ,उमर क्या धूप की,कहीं नाबालिग तो ना थी छोकरी
कब से दोनों का था चक्कर चल रहा ,और कहाँ था ,सूर्य करता  नौकरी
फिरौती का कहीं तेरे पास तो,कहीं से कुछ फोन तो  आया  नहीं
मैंने बोला ,नहीं,पर उस रोज से ,नज़र मुझको आ रही 'छाया'कहीं
दरोगा जी बोले 'तू मत कर फिकर ,झेल दो दो लड़कियां ना पायेगा
एक मुश्किल से संभलती ,दो के संग,परेशां हो लौट खुद ही आएगा '

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Wednesday, January 20, 2016

भुनना

        भुनना

हमने थोड़ी करी तरक्की ,वो जल भुन  कर खाक हो गए
थोड़े नरम ,  स्वाद हो जाते ,पर वो तो गुस्ताख़ हो  गए
कड़क अन्न का एक एक दाना ,भुनने पर हो जाय मुलायम
स्वाद मूंगफली में आ जाता ,उसे भून जब  खाते  है हम
मक्की दाने सख्त बहुत है,ऐसे  ना खाए  जा सकते
बड़े प्रेम से सब खाते जब ,भुन  कर'पोपकोर्न' वो  बनते
जब भी आती नयी फसल है ,उसे भून कर हम है खाते
चाहे लोढ़ी हो या होली ,खुश  होकर त्योंहार  मनाते
होता नोट एक कागज़ का ,मगर भुनाया जब जाता है
चमकीले और खनखन करते ,सिक्कों की चिल्लर लाता है
जिनकी होती बड़ी पहुँच है ,उसे भुनाया  वो करते है
लोग भुनाते  रिश्तेदारी  ,मौज  उड़ाया  वो करते है
भुनना ,इतना सरल नहीं है, अग्नि में सेकें जाना  है
लेकिन भुनी चीज खाने का ,हर कोई ही दीवाना  है
गली गली में मक्की भुट्टे ,गर्म और भुने मिल जाते है
शकरकंदियां , भुनी आग में ,बड़े शौक से सब खाते  है    
ना तो तैल ,नहीं चिकनाई,अन्न आग में जब भुनता है
होता 'क्लोस्ट्राल फ्री' है,और स्वाद  दूना  लगता  है
लइया ,खील ,भुनो चावल से ,लक्ष्मी पर परसाद चढ़ाओ
है प्रसाद बजरंगबली का ,भुने चने ,गुड के संग  खाओ
औरों की तुम देख तरक्की ,बंद करो अब जलना ,भुनना
आगे बढ़ने का उनसे तुम,सीखो  सही रास्ता  चुनना
अगर आग में अनुभवों की ,भुन कर तुम सके जाओगे
बदलेगा व्यक्तित्व तुम्हारा ,सबके मन को तुम भाओगे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

चने से बनो

           चने से बनो

चने को चबाना ,बड़ा यूं तो  मुश्किल,
मगर भून लो ,स्वाद आये  करारा
चने को दलों तो ,बने दाल  प्यारी ,
अगर पीसो ,बनता है ,बेसन निराला 
ये  बेसन कि जिससे ,बनाते पकोड़े,
कभी भुजिया बनती या आलूबड़े है 
कभी ढोकला है ,कभी खांडवी है ,
कभी गांठिया है ,कभी फाफडे है
बनाते है कितने ही पकवान इससे ,
कभी बेसन चक्की,कभी बूंदी प्यारी ,
उसी से ही बनते है बेसन के लड्डू ,
कितनी  ही प्यारी ,मिठाई निराली
अगर बनना है कुछ ,चने से बने हम,
हमें सिकना होगा या पिसना पड़ेगा
तभी बन सकेंगे ,मिठाई से प्यारे ,
तभी प्यार लोगों का ,हमसे  बढ़ेगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जो माँ का प्यार ना मिलता

         जो माँ का प्यार ना मिलता

जो माँ  का प्यार ना मिलता ,तो हम जो हैं ,वो ना होते
पिता की डाट ना  पाते ,तो हम जो हैं ,वो ना होते
हमें  माँ ने  ही पैरों  पर,खड़े होना सिखाया है
हमारी थाम कर ऊँगली ,सही रस्ता दिखाया है
आये जब आँख में आंसूं ,तो आँचल से  सुखाया है
सोई गीले में खुद,सूखे में ,पर हमको सुलाया  है
जरा सा हम टसकते थे ,तो वो बेचैन  होती  थी
हमें तकलीफ होती थी ,दुखी होकर वो रोती  थी
पिलाया दूध छाती से ,हमें पाला ,किया पोषण
रखा चिपटा के सीने से ,हमारा ख्याल रख हर क्षण
पुष्प ममता का ना खिलता ,तो हम जो है ,वो ना होते
जो माँ का प्यार ना मिलता ,तो हम जो है ,वो ना होते 
 पिताजी प्यार करते पर ,अलग अंदाज था उनका
डरा करते से हम उनसे और चलता  राज था उनका
वो बाहर सख्त नारियल थे,मगर अंदर मुलायम थे
बड़ा था संतुलित जीवन ,महकते जैसे चन्दन थे
उन्ही का आचरण ,व्यवहार ,हरदम कुछ सिखाता था
उन्ही का सख्त अनुशासन ,भटकने से बचाता  था
उन्होंने धर्म ,धीरज की ,हमें शिक्षा  सिखाई  थी
लक्ष्य पाने को जीवन का ,राह उनने  बताई  थी
अगर वो पाठ ना पाते ,तो हम जो है ,वो ना होते
पिता की डाट ना पाते ,तो हम जो है ,वो ना होते

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'