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Wednesday, July 23, 2014

भविष्यवाणी

           भविष्यवाणी

 सभी चैनल पर है  पंडित जी कोई ना कोई ,आते
देख कर के चाल ग्रह की,सभी को है ,ये   बताते
आज दिन बीतेगा कैसे ,आपका भविष्य क्या है
एक दिन की बात ना है ,रोज का ये सिलसिला है
सिर्फ बारह राशियों में ,समय का है खेल चलता
'मेष' के घर क्लेश होगा,'कुम्भ'पायेगा सफलता
'मिथुन'वाले सुखी होंगे,मान कर पत्नी की बातें
'मीन'का है चन्द्र दुर्बल,रहें शिव पर जल चढ़ाते
'कर्क'पर शनि वक्र है ,हनुमानजी का करें पूजन
'बन रहा धन योग 'धनु' अचानक ही आएगा धन
और 'वृश्चिक',रहे निश्चित,शीध्र उनके दिन फिरेंगे
एक नरियल,बहते जल में,वो अगर जो बहा देंगे
संभल करके  रहे'कन्या'राशि,दुर्घटना घटेगी
और 'मकर'वालों सभी की,आज तो चांदी कटेगी
'सिंह' वाले ,क्रोध पर जो ,रखें काबू तो भला है
 मिला जुला रहेगा दिन, जिन्होंकी राशि 'तुला' है
और सब 'वृष'राशि वाले,भावना को रखे वश में
प्रभु का स्मरण करेंगे,वृद्धि होगी ,किर्ती,यश में
पास में आचार्य जी के ,हर एक विपदा की दवा है
जान ही अब गए होंगे , आपका भविष्य  क्या है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Tuesday, July 22, 2014

इन्तजार

           इन्तजार
थे बच्चे भूख जब लगती ,हम रोते और मचलते थे,
  दूध अम्मा पिलाएगी ,यही इन्तजार करते थे
बड़े होकर गए स्कूल,न मन लगता पढाई में ,
बजे कब छुट्टी की घंटी,यही इन्तजार करते थे
मोहब्बत की जवानी में,किसी के प्यार में डूबे,
हमेशा माशुका से मिलन का, इन्तजार करते थे
गृहस्थी का पड़ा जब बोझ,तो फिर मुश्किलें आई,
कभी आएंगे अच्छे दिन,यही इन्तजार करते थे
रहा इन्तजार जीवन भर,कभी इसका,कभी उसका ,
सिलसिला अब बुढ़ापे में ,भी वो का वो ही जारी है
जिंदगी के सफर का अब,अंत नजदीक आने को ,
न जाने मौत  कब आये,उसी की  इंतजारी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मोमबत्ती जल रही है

                मोमबत्ती जल रही है

आजकल इस देश में क्या हो रहा है,
          नहीं कोई की समझ में आ रहा है
लोग कहते हम तरक्की कर रहे है,
           रसातल पर देश लेकिन जा रहा है
दो बरस की नन्ही हो मासूम बच्ची ,
            या भले बुढ़िया पिचासी साल की है
हो रही है जबरजस्ती सभी के संग ,
              दरिंदों के हाथों ना कोई बची है
पाशविक अपनी पिपासा पूर्ण करके ,
               मार देते,पेड़ पर लटका रहे है
आजकल तो इसतरह के कई किस्से,
               रोज ही सबकी नज़र में आरहे है
कोई साधू कर रहा है रासलीला,
               कोई नेता ,लड़कियों को रौंदता है
और सुरक्षा के लिए तैनात है जो,
               पुलिसवाले ,थाने में करते खता है
नौकरी का देके लालच कोई लूटे,
              कोई शादी का वचन दे और भोगे
कोई शिक्षागृहों में कर जबरजस्ती,
              खेलता है नन्ही नन्ही बच्चियों से
 मामला जब पकड़ता है तूल ज्यादा,
               कान में सरकार के जूँ  रेंगती है
दे देती मुआवजा कुछ लाख रूपये ,
              अफसरों को ट्रांसफर पर  भेजती है
नेता करने लगते है बयानबाजी,
             देश है इतना बड़ा ,क्या क्या करें हम
अपराधी है अगर नाबालिग बचेगा,
             इस तरह अपराध क्या होंगे भला कम
आज ये हालात है अस्मत किसी की,
             किस तरह से भी सुरक्षित है नहीं अब
किस तरह इस समस्या का अंत होगा,
             किस तरह हैवानगी यह रुकेगी सब
रोज ही ये वारदातें हो रही है ,
             और मानवता सिसकती रो रही है
और नेता सांत्वना बस दे रहे है,
              सभी शासन की व्यवस्था सो रही है
देश के नेता पड़े कर बंद आँखें,
               जागरूक जनता प्रदर्शन कर रही है
किन्तु होता सिर्फ ये कि पीड़िता की,
                 याद में कुछ मोमबत्ती जल रही है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, July 21, 2014

मिले है ऐसे प्रीतमजी

               मिले है ऐसे प्रीतमजी

बताएं क्या तुम्हे हम जी
मिले है ऐसे प्रीतम  जी
       पड़े रहते है ये घर पर
        करें ना काम रत्ती भर
        कभी ये लाओ,वो लाओ,
        चलाते हुक्महै दिन भर
तंग हो जाते है हम जी
मिले है ऐसे प्रीतम जी
      दिखाते है कभी पिक्चर
      कराते है डिनर बाहर
      तबियत के रंगीले है,
      सताते है हमें  जी भर
नहीं कोई से है कम जी
मिले है ऐसे प्रीतम जी
       प्यार पर जब दिखाते है
       बनाते   खूब    बातें है
        रात को करते है वादे,
        सवेरे  भूल  जाते है 
निकला करते है दम जी
मिले है ऐसे प्रीतम जी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पुराने खिलाड़ी

            पुराने खिलाड़ी

न तो देखो धुला कुरता ,फटी बनियान मत देखो
          धड़कता इनके पीछे जो, दीवाना सा है दिल देखो
सफेदी देख कर सर की ,नहीं बिदकाओ  अपना मुंह,
            पुराने हम खलाड़ी है ,कभी हम से तो मिल देखो
       पुराने स्वाद चावल है ,अनुभव का खजाना है 
        चखोगे ,याद रख्खोगे ,माल परखा ,पुराना है
 नए नौ दिन,पुराने सौ दिनों तक काम आते है ,
       इस भँवरे का दिवानापन,कभी फूलों सा खिल देखो                 
'घोटू '

उम्र है मेरी तिहत्तर

       उम्र है  मेरी तिहत्तर

जिंदगानी के सफर में ,मुश्किलों से रहा लड़ता
आ गया इस मोड़ पर हूँ,कभी गिरता ,कभी पड़ता
ना किया विश्राम कोई,और रुका ना ,कहीं थक कर
                                           उम्र है मेरी तिहत्तर
जवानी  ने बिदा ले ली ,भले कुछ  मुरझा रहा तन
जोश और जज्बा पुराना ,है मगर अब तलक कायम
आधा खाली दिख रहा पर,भरा है आधा कनस्तर
                                           उम्र है मेरी तिहत्तर  
भले ही सर पर हमारे ,सफेदी सी छा रही  है
पर हमारे हौंसले की ,बुलंदी वो की  वो ही है
दीवारें मजबूत अब भी ,गिर रहा चाहे पलस्तर
                                       उम्र मेरी है तिहत्तर  
छाँव दी कितने पथिक को ,था घना मैं जब तरुवर
दिया पंछी को बसेरा और बहाई हवा शीतल
फल उन्हें भी खिलाएं है,मारा जिनने ,फेंक पत्थर
                                           उम्र मेरी है तिहत्तर
किसी से शिकवा न कोई ,ना किसी को कोसता हूँ
न तो कल को भूल पाता और न कल की सोचता हूँ
पा लिया मैंने बहुत कुछ,जैसा था मेरा मुकद्दर
                                      उम्र मेरी है तिहत्तर
बेसुरी सी हो रही है  उमर के  संग  बांसुरी है
लग गयी बीमारियां कुछ,किन्तु हालत ना बुरी है
ज़रा ब्लडप्रेशर बढ़ा है,खून में है अधिक शक्कर
                                         उम्र है मेरी तिहत्तर
कठिन पथ है ,राह में कुछ ,दिक्कतें तो आ रही है 
चाल है मंथर नदी की ,मगर बहती जा रही है
 कौन जाने कब मिलेगा ,दूर है कितना समंदर
                                        उम्र है मेरी तिहत्तर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, July 19, 2014

बदपरहेजी

         बदपरहेजी

ये सच है मैं तुम्हारा हूँ,तुम्हारा ही रहूंगा पर,
   हुस्न बिखरा हुआ सब ओर है,दीदार करने दो
निमंत्रण दे रहे है फूल इतने,बाग़ में खिलते ,
    ज़रा सी छूट दे दो ,मुझको इनसे प्यार करने दो
यूं तो अक्सर ही तुम इंकार,मुझसे करती रहती हो,
   करोगी आज जो इंकार,  मानूंगा न मैं  हरगिज
रोज ही दाल रोटी, घर की खाता ,जैसी भी मिलती,
     परांठा मिल रहा है,खाऊंगा,मुझको चढ़ी है जिद
मुझे मधुमेह है,मिठाई पर पाबंदियां है पर,
      कब,कहाँ इसतरह मधु के छलकते जाम मिलते है
चार दिन ,चार गोली ज्यादा खा लूँगा दवाई की,
       हमेशा चूसने को कब, दशहरी  आम मिलते है
नहीं रोको तुम मुझे बस थोड़ी  बदपरहेजी करने दो ,
    बड़ी किस्मत से मिल पाते है,ये इतने हसीं  मौके
देखलो फिर बगावत पर ,उतर आऊंगा वर्ना मै ,
    आज पर रुक नहीं सकता ,भले कितना ,कोई रोके

घोटू 

संवाद -बादल से

          संवाद -बादल से

मुझसे कल पूछा बादल ने ,बताओ मैं कहाँ बरसूँ
              चाहते सब है बरसूँ मैं ,पर छतरी तान लेते है
सिर्फ धरती है जो मुझको,समा लेती  सीने में ,
             और बाकी सब बहा देते ,पराया मान लेते है               
बहुत जी चाहता मेरा ,मिलूं आकर के धरती से,
            हवाएँ आवारा  लेकिन मुझे अक्सर उडा लेती ,
सरोवर पीते मेरा जल ,मगर नदियां बहा देती ,
             समंदर भी उडा  देते,नहीं अहसान  लेते  है

घोटू

Friday, July 18, 2014

खाते पीते लोग

          खाते पीते लोग

भूख अपनी मिटाने में,
रहे हम व्यस्त  खाने में
बताएं आपको अब क्या,कि हम क्या क्या नहीं खाये
भाव हमने  बहुत खाये
घाव हमने  बहुत  खाये
वक़्त की मार जब खाई ,तब कहीं जा संभल पाये
रिश्वतें भी बहुत खायी
कमीशन भी बहुत खाया ,
बड़े ही खानेपीने वाले,ऑफिसर थे कहलाये 
गालियां खाई लोगों से,
और खाये बहुत  धोखे ,
ठोकरें खा के दर दर की ,मुकाम पे हम पहुँच पाये
मन नहीं लगता था घर में
पड़े उल्फत के चक्कर में ,
पटाने उनको,उनके घर के चक्कर भी बहुत खाये
मिली बस दाल रोटी घर
दावतें खाई,जा होटल,
मिठाई खूब खाई ,चटपटी हम ,चाट चटखाये
डाट साहब की दफ्तर में
और  घरवाली की घर में
खूब खाई ,तभी तो हम,ढीट है इतने बन  पाये
बुढ़ापे में है ये आलम
दवाई खा रहे है हम
हो गया है हमें अरसा ,मिठाई कोई भी खाये
कमाया कम,अधिक खाया
मगर वो पच नहीं पाया
माल चोरी का मोरी में ,बहा  कैसे ,क्या बतलायें
इधर भी जा ,उधर भी जा
सारी दुनिया का  चक्कर खा
गये थे घर से हम बुद्धू ,लौट बुद्धू ही घर आये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 
 

पीले से प्रीत

       पीले से प्रीत

आम,संतरा और मौसम्बी ,केला और पपीता सब ही,
     अक्सर स्वाद भरा हर एक  फल ,ये देखा है  पीला होता
पीले सब नमकीन ,पकोड़े,पीली बूंदी,बेसन लड्डू,
     चाहे  जलेबी ,राजभोग हो , कितना स्वाद  रसीला  होता
 पीले होते  स्वर्णाभूषण ,और पीताम्बरधारी भगवन,
      उगता ,ढलता सूरज पीला, चन्दा है चमकीला   होता
इसीलिये जब शादी होती ,कहते पीले हाथ कर दिए ,
      हल्दी चढ़ने से दुल्हन का ,कितना रूप  खिला है होता

घोटू 

आम या ख़ास

             आम या ख़ास

दशहरी हो या फिर लंगड़ा ,हो चौंसा या कि अल्फांसो,
          आम ,कोई  न आम होता  ,हमेशा  ख़ास  होता   है
माशुका की तरह उनका ,स्वाद जब मुंह में लग जाता ,
          लबों पर उसकी लज्जत का,गजब अहसास होता है
ज़रा सा मुंह में लेकर के ,पियो जब घूँट तुम रस की,
            हलक में जा रहा अमृत ,यही आभास   होता है  
गुट्ठिया चूस कर देखो , रसीली,रसभरी होती ,  ,
             हरेक रेशे में रस ही रस , बड़ा  मिठास होता है
घोटू

खून का खेल

            खून का खेल
एक तो तंग हमको कर कर रखा इन मच्छरों ने है ,
               रात भर तुनतुनाते और हमारा खून पी जाते
दूसरा तंग हमको कर रखा इन डाक्टरों ने है,
             बिमारी कोई हो ना हो,   खून का टेस्ट  करवाते
तीसरा घर की घरवाली ,रोज फरमाइशें कर कर,
               अदा से प्यार से ,मनुहार से सब खून पीती है 
बॉस दफ्तर में कस कर,काम करवाते है खूं पीते,
               नहीं केवल हमारी ये ,सभी की आपबीती है
खौलता खून है सबका ,मगर कुछ कर नहीं पाते ,
               हमारा खून पीती ,मुश्किलें ,जो रोज आती है
और उस पे ये मंहगाई ,हमारे खून की दुश्मन,
            मुंह सुरसा  सा फैलाती ,दिनोदिन बढ़ती जाती है
रोज हम लेते है लोहा,जमाने भर की दिक्कत से ,
            मात्रा 'आयरन 'की खून में ,बिलकुल न बढ़  पाती
कभी 'ऐ 'है,कभी 'ओ'है ,कभी 'बी पोसिटिव'कहते,
           खून की कितनी भाषाएँ ,समझ में ही नहीं आती 
हो गए इस तरह से 'प्रेक्टिकल'लोग दुनिया के ,
           आजकल खून का रिश्ता ,बड़ी मुश्किल से निभता है
गए दिन खून की सौगंध खाने वाले वीरों के ,
            आजकल खून तो एक 'कमोडिटी'है,खूब बिकता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Re: प्रियतम ,मैं आटा ,तुम पानी



On Sunday, July 13, 2014, madan mohan Baheti <baheti.mm@gmail.com> wrote:
घोटू के पद

प्रियतम ,मैं आटा ,तुम पानी
पूरी,परांठा या जैसी भी,रोटी हमें बनानी
बहुत जरूरी ,गुंथे ढंग से ,आटा मिल संग पानी
और पलेथन ,लगे प्यार का ,रोटी अगर फुलानी
गरम गृहस्थी के चूल्हे पर ,जल्दी से सिक जानी
तब ही तो स्वादिष्ट बनेगी,रोटी,नरम सुहानी
जितनी प्रीत मुझे है तुमसे,उतनी तुम्हे दिखानी
तालमेल हो सही ख़ुशी से ,काट जाए जिंदगानी

घोटू

Wednesday, July 16, 2014

सोचो -समझो -करो

           सोचो -समझो -करो

आज जो काम करना है,उसे कल पर नहीं टालो ,
             वक़्त जो बीत जाता है,नहीं आता दोबारा है
बड़ा हो या की छोटा हो,मगर ये बात पक्की है,
             हरेक डायरिया का होता है ,कहीं पर तो किनारा है
रात को आते जो सपने ,वो अपने आप आते है ,
             जो होते महत्वाकांक्षी ,वो दिन में देखते सपने
ये क्यों होता बुढ़ापे में,भूल जाते है अपने ही,
              मगर ऐसा भी होता है,पराये जाते हो अपने
हरेक मौसम का अपना ही ,अलग मिजाज होता है ,
              गरम है तो कभी ठंडा ,कभी बरसात होती है
उजेला हो जो सूरज का,तो हम कहते है क़ि दिन है,
               मगर दिन भी बुरे,  अच्छे ,ये कैसी बात होती है ,
मुझे कल पूछा बादल ने ,बताओ मैं कहाँ बरसूँ,
              चाहते सब है बरसूँ मैं ,पर छतरी तान लेते है
बड़े नादान है हम सब,दिया है जिसने ये सब कुछ  ,
               उसी को कुछ चढ़ा सिक्के ,ये कहते दान देते है
आदमी कितना मूरख है,खबर जिसको नहीं कल की,
                  बनाता जिंदगी भर की,हज़ारों योजनाएं वो
व्यर्थ ही कल की चिंता में ,हुआ जाता है वो बेकल,
                  भरोसा कौनसा कल का,कल तलक जी भी पाये वो 
व्यर्थ काहे का रोना है ,जो होना है सो होना है,
                  मुसीबत ,आना,आएगी ,हंसो या रो के तुम झेलो
करो बस आज की परवाह,सामने जो खड़ा हाज़िर ,
                  छोड़ दो कल की चिंताएं,मज़ा तुम आज का ले लो
 अरे देखो नदी को ही,जो कल कल करती बहती हैं ,
                  यही आशा लिए मन में,मिलेगी कल समंदर से
लगन से जो चलेंगें हम,ठिकाना मिल ही जाएगा,
                   नहीं कुछ भी है नामुमकिन,अगर हो जोश अंदर से
थी पतली धार उदगम पर,रही मिलती वो औरों से ,
                तभी सागर पहुँचने तक,पात हो जाता चौड़ा है
इसलिए सबको अपनाओ,सभी के साथ मिल जाओ,
                बहुत हो जाता है मिल कर,कोई कितना भी थोड़ा हो
हवा तो बस हवा ही है,हमेशा बहती रहती है,
                मगर जब सांस  बनती  है,चलाती जिंदगानी है
हो जैसी भी परिस्तिथियाँ , उसी अनुसार चलना है,
                 किसी भी पात्र में उसके मुताबिक़ ,ढलता पानी है
सुबह टी वी में ज्योतिषी ,ग्रहों की चाल बतलाता ,
               फलाँ है राशियाँ जिनकी ,मिलेगी उनको खुशखबरी
खबर जब है नहीं हमको,कोई भी अगले एक पल की,
               आज हम है  और ज़िंदा है ,बड़ी सबसे ये खुशखबरी
सोच कर ये कि कल पकवान ,मिल सकते है खाने को,
                आज हम भूखे रहने की ,सजा भुगते ,भला क्यों कर
पता है पेट भरना है ,हमें जब दाल रोटी से ,
                 समझ पकवान उनको ही,उठाएँ ना,मज़ा क्यों कर
  तुम्हे लगते है वो सुन्दर ,उन्हें लगे हो तुम सुन्दर ,
                मगर ये सारी सुंदरता ,नज़र का खेल  है केवल
केरियां कच्ची, खट्टी जो ,समय के संग पकेगी जब,
                रसीली ,स्वाद  और  मीठी ,लगेगी आम वो बन कर
हवा के साथ चलने पर ,हवा है पीठ थपकाती ,
                हवा के सामने चलते,हवा भरती है बाहों में
दिक्कते तो हमेशा हैं,मगर जो तुम में जज्बा है ,
              मिलेंगी मंजिलें ,अड़चन ,भले कितनी हो राहों में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, July 15, 2014

देखे सपने

             देखे सपने

जग देखे सोयी आँखों से
मैंने उड उड़ ,बिन पाँखों से
बिना पलक अपनी झपकाये ,
            मैंने जग जग ,देखे सपने
अन्धकार का ह्रदय चीर कर
आती ज्योति रश्मि अति सुन्दर
तन मन में उजियारा फैला,
            मैंने  जगमग देखे सपने
जब भी चला प्रेम की राहें
तुझ पर अटकी रही निगाहें
कभी थाम लेगी तू बाँहें ,
            मैंने  पग पग ,देखे सपने
तेरी आस ,संजोये मन में,
रहा भटकता ,मैं जीवन में
रोज रोज ,आपाधापी में ,
              मैंने भग भग ,देखे सपने
कभी भाग्य चमकेगा मेरा
सख्त ह्रदय पिघलेगा तेरा
ये आशा ,विश्वास लिए मैं ,
              हुआ न डगमग ,देखे सपने
      
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

नज़रिया-औरतों का

         नज़रिया-औरतों का

पति गैरों के गुण वाले ,और स्मार्ट दिखते है ,
     पति खुद का  हमेशा ही ,नज़र आता  निकम्मा है
सास में उसको दिखती है ,  कमी खलनायिका की,
       गुणों की खान लगती है ,हमेशा खुद की अम्मा है
ससुर कमतर नज़र आते ,हमेशा ही पिता से है,
      बहन के गाती है गुण पर ,ननद से पट न पाती है
जहाँ पर काटना है जिंदगी ,वो घर  न भाता है ,
          सदा तारीफ़ में वो  मायके के गीत  गाती   है
है खुदऔरत मगर अक्सर यही होता है जाने क्यूँ ,
           नज़र में उसकी,बेटी और बेटे में फरक  होता
बेटियां नूर है घर की ,वो खुद कोई की बेटी है,
          मगर वो चाहती दिल से, बहू उसकी  जने पोता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

उम्र बढ़ी तो क्या क्या बदला

           उम्र बढ़ी तो क्या क्या बदला

गठीली थी जो जंघाएँ ,पड़  गयी गांठ अब उनमे ,
              कसा था जिस्म  तुम्हारा ,हुआ अब गुदगुदा सा है
कमर चोवीस इंची थी ,हुई चालीस इंची अब,
              पेट  पर पड़  गए है सल, हुलिया ही जुदा सा  है
लचकती थी कमर तुम्हारी ,चलती थी अदा से जब ,
              आजकल चलती हो तुम तो,बदन सारा लचकता है
हिरन जैसी कुलाछों में,आयी गजराज की मस्ती,
              दूज का चाँद था जो ,हो गया ,अब वो पूनम का है
भले ही आगया है फर्क काफी तन में तुम्हारे ,
               तुम्हारे मन का भोलापन ,वही प्यारा सा है निर्मल
आज भी प्यार से जब देखती हो,जुल्मी नज़रों से ,
              दीवाना सा मैं हो जाता,मुझे कर देती तुम  पागल
कनक की जो छड़ी सा था ,हुआ है तन बदन दूना ,
               तुम्हारा प्यार मुझसे हो गया है चौगुना   लेकिन
हो गए इस तरह आश्रित है हम एक दूजे पर ,
               न रह सकती तुम मेरे बिन,न मैं रहता तुम्हारे बिन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'     

Monday, July 14, 2014

पुराना माल -तीन चतुष्पद

           पुराना माल -तीन चतुष्पद
                              १
पुराने माल है लेकिन,ढंग से रंग रोगन कर ,
         किया 'मेन्टेन 'है खुद को ,चमकते ,साफ़ लगते है
कमी जो भी है अपनी ,हम,उसे ऐसा छिपाते है,
          लोग ये कहते है तंदरुस्त कितने   आप लगते है
हरेक अंग आजकल नकली ,हमें बाज़ार में मिलता ,
           आप  इम्प्लांट करवा लो,लगालो बाल भी नकली , 
विटामिन और ताक़त की ,गोलियां खूब बिकती है,
           जवाँ खुद ना ,जवानो के ,मगर हम बाप  लगते  है
                          २    
तीन ब्लेडों के रेज़र से,सफाई गाल की करते ,
           लगा कर 'फेयर एंड लवली'रूप अपना निखारा  है
रँगे  है बाल हमने 'लोरियल'की हेयर डाई से,
            कराया 'फेसियल' सेलून' में ,खुद को संवारा है 
 आज भी जब कलरफुल 'ड्रेस में सज कर निकलते है,
            लड़कियां 'दादा' ना  कहती, हमें 'अंकल'बुलाती है,
बूढ़ियाँ भी हमें नज़रें बचाके देख लेती है ,
                 कहे कोई हमें बूढा ,ये  हमको ना गंवारा है 
                           ३
'सेल'है 'एंड सीजन 'का,माल ये सस्ता हाज़िर है ,
          है डिस्काउंट भी अच्छा , ये मौका फिर न पाएंगे
पके है पान खा  लो तुम,न सर्दी ना जुकाम होगा ,
         बहल कुछ तुम भी जाओगे ,बहल कुछ हम भी जाएंगे
पुराना माल है इसको,समझ एंटीक ही ले लो,
       समय के साथ 'वेल्यूं' बढ़ती जाती ऐसी चीजों की,
उठाओ लाभ तुम इसका,ये ऑफर कुछ दिनों का है,
         हाथ से जाने ना दो तुम   ,ये मौका फिर न पाएंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, July 13, 2014

मृतसागर

         मृतसागर

आकुल,व्याकुल,कल कल करती ,कितनी नदियां ,मिलने आती
छोड़ सभी खारापन अपना ,बादल  बनती  और उड़ जाती
मैं चुपचाप,मौन बेचारा ,दिन दिन होता जाता   खारा
सारी पीड़ाये लहरों सी,ढूंढा करती ,कोई किनारा
मुझसे विमुख सभी जलचर है,इतना एकाकीपन सहता
डूब न जाए कोई मुझ में, इतना पितृ भाव है रहता
मन का भारीपन गहराता,घनीभूत होता जाता मैं
सभी भावना,मृत हो जाती,और मृतसागर कहलाता मैं

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

प्रियतम ,मैं आटा ,तुम पानी

घोटू के पद

प्रियतम ,मैं आटा ,तुम पानी
पूरी,परांठा या जैसी भी,रोटी हमें बनानी
बहुत जरूरी ,गुंथे ढंग से ,आटा मिल संग पानी
और पलेथन ,लगे प्यार का ,रोटी अगर फुलानी
गरम गृहस्थी के चूल्हे पर ,जल्दी से सिक जानी
तब ही तो स्वादिष्ट बनेगी,रोटी,नरम सुहानी
जितनी प्रीत मुझे है तुमसे,उतनी तुम्हे दिखानी
तालमेल हो सही ख़ुशी से ,काट जाए जिंदगानी

घोटू