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Tuesday, September 2, 2014

बारिश में भीजेंगे

       बारिश में भीजेंगे

आ चल बारिश में भीजेंगे
बिना बाल्टी और रस्सी के ,सूरज पानी खींचा करता
और बादलों की टंकी में ,अपनी जब वह नभ में भरता
जब जब धरती प्यासी होती,फव्वारों सा बरसाता है
उस रिमझिम में जब नहाते है,हमको बड़ा मज़ा आता है
ना तो कोई सीमित धारा ,और ना  कोई चार दिवारी
खुल्ला विस्तृत बाथ रूम तब,बन जाती है दुनिया सारी
आसमान से आती बूँदें तन को चुभ चुभ सी जाती है
पूरे तन की मालिश करती हुई  हमें वो सहलाती  है
नीचे भू पर बहता पानी और ऊपर से आती   वर्षा 
उछल कूद कर,नाच भीगना  ,सचमुच मन देता है हर्षा
पानी की बूँदें शीतल  पर,तन मन में है आग लगाती
तनऔरवसन एक दिखते जब तन में सिहरन सी छाजाती
मन में प्रीत उमड़ आएगी ,एक दूसरे  पर रीझेंगे
आ चल बारिश में भीजेंगे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

मिलनी मोहलत चाहिए

           मिलनी मोहलत  चाहिए

मन मे होना चाहिए कुछ कर गुजरने का जूनून ,
      लगा जी,जुटना पडेगा ,अगर शोहरत  चाहिए
यूं तो सब ही काटते है ,पर सफल वो जिंदगी,
     नाम थोड़ा चाहिए और थोड़ी  इज्जत  चाहिए
बूढ़े बूढ़े लोग भी चढ़ जाते है एवरेस्ट पर,
      थोड़ा जज्बा चाहिए और थोड़ी हिम्मत चाहिए
बिना माचिस  जलाये भी,लोग जलने लगेगें ,
      आप  हो  खुशहाल ,बीबी  खूबसूरत  चाहिए
हमने अपनी जिंदगी का किया सौदा आपसे,
      रुंगावन  में प्यार ,कीमत में रियायत  चाहिए
इतनी सुन्दर रची दुनिया ,जिंदगी दी चार दिन,
     ऐ खुदा!एक और दिन की ,मिलनी मोहलत चाहिए

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
          स्मार्टवाच
नाचते जिसके इशारों पर उमर सारी रहे ,
        हमने अपनी कलाई पर ,उनकी फोटो खींच ली
स्मार्ट है ये वाच या फिर हो गए हम स्मार्ट है,
      कैद मुट्ठी पर किया और मिटा अपनी खीज ली            
घोटू

                    दीवानगी
चाँद बादल में छिपा पर देते उसको अर्घ्य है ,
            ये हमारी आस्था और श्रद्धा की है बानगी
तुमने घूंघट में छिपा कर रखा अपना चन्द्रमुख,
      फिर भी तुम पर मर मिटे ,ये हमारी दीवानगी 
घोटू

                    बरकत
आपका सजना संवरना ,सबका सब बेकार  है ,
       जिंदगी में आपकी जो किसी से चाहत नहीं
कितने ही स्वादिष्ट सुन्दर,आप व्यंजन पकाएं ,
      कोई यदि ना सराहे ,होती सफल मेहनत नहीं
हरे पीले लाल नीले ,कितने भी रंगीन हो ,
      फूलों में खुशबू नहीं तो काम की रंगत नहीं
बिन पसीना बहाये ,आये ,न हो ईमान की,
     'घोटू' ऐसी कमाई में ,होती है बरकत नहीं
घोटू
             चाय की चुस्की
चाहते जो आप जीना मस्ती से सारी उमर ,
     रोज पीना चाहिए फिर दार्जिलिंग की 'ब्लेक टी'
कड़क खुशबू भरी होती चाय भी आसाम की,
     एक प्याला पी लिया तो आ जाती है ताजगी
जीने यदि चाव है,दिल में किसी की चाह है ,
    चाहते हो खुशी से कट जाए सारी   जिंदगी
छोटी छोटी पत्तियों में जोश का जादू भरा,
     चुस्ती लाती है बदन में  ,एक चुस्की चाय की

घोटू   

Monday, September 1, 2014

पैमाना

नर्गिसी आँखों का पैमाना नहीं मिलता
उसके नाम का ठिकाना नहीं मिलता

भूल भी जाता न जाने मै कब का  
उसे भूलने का बहाना नहीं मिलता,

जल जाती हैं तड़प कर रात भर  
शमाओं को परवाना नहीं मिलता,

उन आँखों का सुरूर जो उतार दे  
शहर में वो मयखाना नहीं मिलता|



© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com
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बिजली और बीबी

            बिजली और बीबी

बिजली से होती नहीं कम है हमारी बीबियाँ,
            कड़कती है बिजलियों सी ,होती जब नाराज़ है
बिना उनके दो घड़ी भी गुजारा चलता नहीं,
             होता उनका   इस तरह से आदमी मोहताज है
कंवारी जब होती है तो होती है A .C. करेंट,
            लगता झटका ,अगर छूते ,उनके खुल्ले तार से
शादी करके रहती तो बिजली है,पर A .C . नहीं ,
           बन जाया करती है D .C . चिपकाती है  प्यार से  
कभी स्लिम सी ट्यूब लाईट ,कभी बन कर बल्ब ये,
              अंधियारे जीवन में लाती ,चमचमाती  रोशनी
काम सब करती किचन के ,धोती है कपडे सभी,
               घर को रखती साफ़,सुन्दर,बन कुशल सी गृहणी
सर्दियों में देती ऊष्मा ,हीटरों की तरह वो,
                 गर्मियों में ऐ सी बन कर देती है ठंडक   हमें
दो मिनिट भी चली जाती ,कर देती बेचैन है ,
                  काम उसके बिन न चलता ,जाती पड़ आदत हमें
बन के टी वी दिखाती है ,फैमिली के सीरियल  ,
                    गुनगुनाती रेडियो सी,वो मधुर   संगीत है
और मोबाइल हमारा ,चार्ज करती प्रेम से,
                    बिजली की जैसी ही होती,औरतों की प्रीत है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सब्जियों की गपशप

                सब्जियों की गपशप

शिकायत भिन्डी ने की ,आवारा है 'बैंगन' मुआ ,
                   हरी ताज़ी देख मुझको ,रोज़ ही है छेड़ता
हाँ में हाँ उसकी मिलाई एक 'शिमला मिर्च'ने ,
               बोली बेपेंदी का है,कल हुआ था मुझ पर फ़िदा
बोला मुझसे लगती हूँ  मैं फूली फूली सेक्सी ,
                मैं ज़रा सी मुस्कराई,मेरे पीछे पड़  गया  
है बड़ा ही फ्लर्ट टाइप का ये बन्दा इस कदर,
            'लाल कॅप्सिकम'दिखी,उसकी तरफ वो बढ़ गया
बीन्स की पतली  फली ने मारा ताना रहने दे ,
              तू भी तो शौक़ीन ,नज़रें हर तरफ है  मारती
कल ही मैंने देखा तुझको आलू के आगोश में,
              कौनसी तू सती है ,जिसकी उतारें आरती
हरे धनिये ने कहा करते है हम भी इश्क़ पर,
               ऊपर ही ऊपर से सबको , सहला लेते रोज है
 मगर ये आलू भी सचमुच है गजब का इश्क़िया ,
              मिल के हरएक सब्जी के संग,ये  उड़ाता मौज है
सब्जियों में चल रही थी इस तरह की गूफ्तगू ,
              एक टमाटर नज़र आया ,लाल , प्यारा ,रसभरा
सब की सब ही बावली सी  उसके पीछे पड़ गयी ,
              और पकने लगा सबके साथ   उसका  माज़रा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, August 30, 2014

अंदर बाहर

            अंदर बाहर

जो बाहर से कुछ दिखते है,
                अंदर कुछ और हो सकते है
नहीं जरूरी वैसे ही हों,
                 जैसे   बाहर  से  लगते  है
बाहर है तरबूज हरा पर ,
                   लाल लाल होता है अंदर
होता श्वेत सेव फल अंदर,
                   लेकिन लाल लाल है बाहर
बाहर कुछ है,अंदर कुछ है ,
                    खरबूजा भी कुछ ऐसा है
लेकिन पीला पका आम फल ,
                     बाहर भीतर एक जैसा है
कच्चे फल कुछ और दिखते है ,
                    बदला करते जब पकते है
जो बाहर से कुछ दिखते है,
                    अंदर कुछ और हो सकते है
केला हो या लीची हो पर ,
                       सबकी ऐसी ही हालत है
वैसे ही कुछ इंसानों की,
                       कुछ है सूरत,कुछ सीरत है
कोई  में  रस होता है तो ,
                          कोई  में  गूदा  है  होता 
कोई में गुठली होती है,
                        सब कुछ जुदा जुदा है होता
   पोले ढोल हुआ करते जो ,
                        वो थोड़े  ज्यादा  बजते है
जो बाहर से कुछ दिखते है,
                       अंदर कुछ और हो सकते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

आंसू

                    आंसू

आंसू सच्चे मित्र और हमदर्द दोस्त है ,
           जब भी होता दर्द ,आँख में आ जाते है
देकर चुम्बन गालों को पुचकारा करते ,
            धीरे धीरे बह  गालों  को  सहलाते   है
जब खुशियों के पल आते मन विव्हल होता ,
 तो ये आँखों से मोती बन, बिखरा करते ,
औरजब दुख के बादल छाते,घुमड़ाते है ,
          नयन नीर बन,तब ये बरस बरस जाते है
जब पसीजता है अंतरतर सुख या दुःख से,
तो यह निर्मल जल नयनों से टपका करता ,
और इनकी बूंदों में इतनी ऊष्मा होती ,
            पत्थर से पत्थर दिल को भी पिघलाते है
अधिक परिश्रम करने पर या अति ग्रीष्म में,
तन के  रोम  रोम से  स्वेद  बहा  करता  है ,
किन्तु भाव जो मन को पिघलाया करते है ,
             आँखों के रस्ते आंसू  बन कर   के आते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'        

यक्ष प्रश्न

          यक्ष प्रश्न

हे भगवान !मुझे ये बतला दे कि ,
मर्दों के साथ ही ,क्यों होता ये अन्याय है
बैल हमेशा हल जोतता रहता है,
और माँ कह कर पूजी जाती गाय  है
विवाह उत्सव में,सजी धजी घोड़ी पर,
दूल्हे राजा को बिठाया जाता है
और बेचारे घोड़े से  हमेशा ही ,
तांगे  या इक्के को खिंचवाया जाता है
मुर्गी अंडा देती है ,इसलिए ,
उसकी होती अच्छी देखभाल है
और बेचारा मुर्गा ही क्यों ,
हमेशा होता हलाल है
भैस दूध देती है तो उसे,
खिलाया पिलाया जाता है
और भेसे से ,भैंसागाडी को,
हमेशा खिंचवाया जाता है
मर्द ,दिन भर काम में पिसता रहता ,
करता कमाई है
और घर पर चैन से ऐश करती ,
उसकी लुगाई है
और जब सब मादाओं को ,
आदमी बहुत करता है प्यार
तो क्यों फिर बेटियां ,
जन्म लेने के पहले ही ,
कोख में दी जाती है मार ? 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, August 29, 2014

Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: तन्हाईयाँ Tanhayiyan

Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: तन्हाईयाँ Tanhayiyan:

मेरी तन्हाईयाँ
आज पूछती है मुझसे

कि वो भूले बिसरे हुए गमजदा आँसू
जो निकले तो थे
तुम्हारी आँखों की पोरों से
पर जिन्हें कब्र तक नसीब नहीं हुयी
जमीं तक नसीब नहीं हुयी

जो सूख गए ....

Wednesday, August 27, 2014

हम बूढ़े है

      हम बूढ़े है

हम बूढ़े है,उमर हो गयी ,
      लेकिन नहीं किसी से कम है
स्वाभिमान के साथ जियेंगे ,
      नहीं झुकेंगे,जब तक दम  है
साथ उमर के ,शिथिल हुआ तन,
     किन्तु हमारा मन है चंगा
जो भी चाहे,लगाले डुबकी ,
    भरी प्यार की,हम है गंगा
सबको पुण्य प्रदान करेंगे,
    जब तक जल है,बहते हम है
स्वाभिमान से जिएंगे हम ,
   नहीं झुकेंगे,जब तक दम है
चाह रहे तुमसे अपनापन ,
     शायद हमसे हुई भूल है
पान झड़ गए सब पतझड़ में,
    हम फुनगी पर खिले फूल है
हमने आते जाते देखे,
   कितने ही ऐसे  मौसम है
स्वाभिमान से जिएंगे हम,
    नहीं झुकेंगे ,जब तक दम है 
अनुभव की चांदी बिखरी है ,
    काले केश हो रहे  उज्जवल
सूरज जब ढलने लगता है,
         किरणे होजाती है शीतल
जहाँ प्यार की धूप पसरती ,
        हम वो खुला हुआ  आँगन है
स्वाभिमान से जिएंगे हम,
    नहीं झुकेंगे,जब तक दम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मारामारी

        मारामारी

अगर साथ देती जो किस्मत हमारी
 नहीं करनी पड़ती हमें मारा मारी
 कभी हमने भी खूब मारी थी मस्ती ,
बड़ी बेफिकर ,जिंदगी थी हमारी
बहुत गप्प मारी,बहुत झक्क  मारी ,
करते रहे हम, यूं ही चाँद मारी
कभी आँख मारी,कभी मारे चक्कर ,
लगी इश्क़ करने की हमको बिमारी
लगे लोग कहने ,हमें मजनू मियां ,
हुई आशिकों में ,हमारी शुमारी
बड़ी मुश्किलों से पटाई थी लड़की,
मगर बन गयी है वो बीबी हमारी
रही थोड़े दिन तक  तो छाई खुमारी,
गृहस्थी की हम पर,पड़ी जिम्मेदारी
फंसा इस तरह दाल आटे का चक्कर ,
यूं ही मरते मरते कटी   उम्र   सारी

घोटू  

बदला हुआ माहौल

        बदला  हुआ माहौल

आजकल कुछ इस तरह,बदला हुआ माहौल है,
          बदतमीजी,बददिमागी,बदमिज़ाजी  आम है
प्रेम के बंधन में कोई,बंधता है ना बांधता ,
          हो गया है इस कदर ,खुदगर्ज हर इंसान है
सिखाया करते थे हमको पाठ अमन-ओ-चैन का,
       अदावत और झगडे ही बन गया उनका काम है      
था जो गुलशन ,गुलों से गुलजार हरदम महकता ,
                कांटे वाले केक्टस अब बने उसकी शान है 
ठंडी ठंडी हवाएँ जो सहलाती थी जिस्म को,
               आजकल झझकोरती  है ,बन गयी तूफ़ान है
इस तरह के हाल से हैं हम गुजरने लग गए,
              ये हमारी अपनी ही करतूत का  अंजाम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, August 26, 2014

कहीं काबा..कहीं बुतखाना

कहीं काबा,कहीं बुतखाना,कहीं गिरजा बना डाला,
मेरे मौला....तेरी रहमत का बाज़ार बना डाला,
बनते थे जो कल तलक रहनुमा तेरी खुदाई का,
सरे-राह.... आज तेरी रूह का सौदा कर डाला,
दिखाता था वो जो अंधेरों में भी रोशनाई मुझे ,
बना के राम और साईं,टुकड़ों में उसे बाँट डाला.


© रविश 'रवि'
raviishravi.blogspot.com

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Monday, August 25, 2014

औरत के आंसू

              औरत के आंसू

औरत के आंसू से,हर कोई डरता है
धनीभूत गुस्सा जब ,आँखों से झरता है
चंद्रमुखी की आँखें,ज्वालामुखी बन जाती ,
लावा से बहते है ,आंसू जब गालों पर
तो उसकी गर्मी से ,पिघल पिघल जाते है,
कितने ही योद्धा भी,जिनका दिल है पत्थर
घातक है नयन नीर,अबला  का ये बल है
जब टपका करता है,आँखों से बन मोती
एक जलजला जैसे ,घरभर में आ जाता,
गुस्से में विव्हल हो,घरवाली जब रोती
बड़े धाँसू होते है,औरत के ये आंसूं ,
चार पांच ही बहते ,प्रलय मचा देते है
वैसे तो जल की ही ,होती है कुछ बूँदें,
मगर जला देते है ,आग लगा देते है
अपनी जिद मनवाने का अमोघ आयुध ये,
वार कभी भी जिसका ,नहीं चूक पाता है
चाहे झल्ला कर के ,चाहे घबराकर के ,
पतिजी से जो सारी ,बातें मनवाता  है
बड़े बड़े शूरवीर ,ध्वस्त हुआ करते है ,
औरत का ब्रह्म अस्त्र ,जब भी ये चलता है
मृगनयनी आँखों से ,छलक छलक बहा नीर ,
देता है ह्रदय चीर ,आदमी पिघलता है
बस उसका ना चलता ,बस बेबस हो जाता ,
बात  मान लेता बस ,मरता क्या करता है
 घनीभूत गुस्सा जब आाँखो से झरता है
औरत के आंसूं से ,हर कोई डरता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Saturday, August 23, 2014

Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein

Life is Just a Life - Neeraj Dwivedi: गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein:

तरस रहीं दो आँखें बस इक अपने को

मोह नहीं छूटा जीवन का,
छूट गए सब दर्द पराए,
सुख दुख की इस राहगुजर में,
स्वजनों ने ही स्वप्न जलाए,
अब तो बस कुछ नाम संग हैं, जपने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को।

जर्जरता जी मनुज देह की, ....

Thursday, August 21, 2014

कान्हा -बुढ़ापे में

         कान्हा -बुढ़ापे में

कान्हा बूढ़े,राधा बूढी ,कैसी गुजर रही है उन पर
बीते बचपन के गोकुल में,दिन याद आते है रहरह कर 
माखनचोर,आजकल बिलकुल ,नहीं चुरा,खा पाते मख्खन
क्लोस्ट्राल बढ़ा,चिकनाई पर है लगा हुआ प्रतिबंधन
धर ,सर मटकी,नहीं गोपियाँ,दूध बेचने जाती है अब
कैसे मटकी फोड़ें,ग्वाले,बेचे दूध,टिनों में भर  सब 
उनकी सांस फूल जाती है ,नहीं बांसुरी बजती ढंग से
सर्दी कहीं नहीं लग जाए ,नहीं भीगते ,होली  रंग से
यूं ही दब कर ,रह जाते है,सारे अरमां ,उनके मन के
चीर हरण क्या करें,गोपियां ,नहा रही 'टू पीस 'पहन के
करना रास ,रास ना आता ,अब वो जल्दी थक जाते है
'अंकल'जब कहती है गोपी,तो वे बहुत भड़क जाते है
फिर भी बूढ़े ,प्रेमीद्वय को,काटे कभी प्रेम का कीड़ा
यमुना मैली, स्विंमिंगपूल में ,करने जाते है जलक्रीड़ा

मदनमोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, August 19, 2014

पति पत्नी बुढ़ापे में-दो अनुभूतियाँ

         पति पत्नी बुढ़ापे में-दो अनुभूतियाँ
                             १
हुई शादी ,मैं रहता था ,पत्नी  के प्यार में डूबा ,
       चली जाती कभी मैके ,बड़ा मैं  छटपटाता था
इशारों पर मैं उनके नाचा करता था सुखी होकर,
        कभी नाराज होती तो,मन्नतें कर मनाता था
फँसी फिर वो गृहस्थी में,और मैं काम धंधे में,
        बुढ़ापे तक दीवानापन ,सभी है फुर्र हो   जाता
बहानेबाजी करते रहते  है हम एक दूजे से,
       कभी  बी पी मेरा बढ़ता ,उन्हें सर दर्द हो जाता
                          २
जवानी में  बहुत  कोसा ,और डाटा उसे मैंने,
               बुढ़ापे में मेरी बीबी ,बहुत  है  डांटती  यारों
रौब मेरा, सहन उसने कर लिया था जवानी में,
               आजकल रौब दूना ,रोज मुझ पर गांठती यारों
जवानी में बहुत उसको ,चिढाया ,चाटा था मैंने ,
                आजकल जम के वो दिमाग मेरा ,चाटती यारों
बराबर कर रही हिसाब वो सारा पुराना है ,
                 मैंने काटी थी उसकी बातें अब वो काटती  यारों

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 
               
       


        

कोयला

                     कोयला
सलाह दी कोई ने ये  कोयले से प्यार मत करना ,
             हुआ पैदा जो जल जल कर ,कहाँ ठंडक दिलाएगा
छुओगे जो गरम को तो,जला फिर  हाथ वो देगा ,
            अगर छुओगे ठन्डे को ,तुम्हे कालिख लगायेगा
हम बोले, चीज कैसी हो ,मगर तुम पे ये निर्भर है ,
            फायदा उसके गुण का ,किस तरह तुम उठा सकते
प्रेस धोबी गरम करता ,छानता कोई पानी है,
           जला कर सिगड़ी रोटी भी ,करारी सेक  खा  सकते

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
 

हम भी कैसे है?

           हम भी कैसे है?

प्रार्थना करते ईश्वर से ,घिरे बादल ,गिरे पानी,
          मगर बरसात  होती है तो छतरी तान लेते है
बहुत हम चाहते  है कि चले झोंके हवाओं के ,
           हवा पर चलती जब ठंडी ,बंद कर द्वार लेते है
हमारी होती है इच्छा ,सुहानी धूप खिल जाये ,
            मगर जब धूप खिलती है,छाँव में  भाग जाते है
 देख कर के हसीना को,आरजू करते पाने की,
           जो मिल जाती वो बीबी बन,गृहस्थी में जुटाते है
हमेशा हमने देखा है,अजब फितरत है इन्सां की  ,
           न होता पास जो उसके  ,उसी की चाह करता  है
मगर किस्मत से वो सब कुछ ,उसे हासिल जो हो जाता ,
          नहीं उसकी जरा भी  फिर,कभी परवाह करता है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'