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Sunday, May 27, 2012

ग़ज़लगंगा.dg: कौन किसकी पुकार पर आया

कौन किसकी पुकार पर आया.
जो भी आया करार पर आया.

तेज़ रफ़्तार कार पर आया.
कौन गर्दो-गुबार पर आया?

सबकी गर्दन को काटने वाला 
आज चाकू की धार पर आया.

जो छपा था महज़ दिखावे को 
मैं उसी इश्तेहार पर आया.

शाख दर शाख कोपलें फूटीं 
खुश्क जंगल निखार पर आया.

उसने दोजख से इक उछाल भरी 
और जन्नत के द्वार पर आया.

एक सौदा निपट गया गोया 
लाख मांगा हज़ार पर आया.

सबके तलवे लहूलुहान मिले 
कौन फूलों के हार पर आया?

जीत पर उतना खुश नहीं था मैं 
जो मज़ा उसकी हार पर आया.

एक तूफ़ान थम गया गौतम 
एक दरिया उतार पर आया.

----देवेंद्र गौतम 


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Friday, May 25, 2012

"ह्रदय तारों का स्पंदन" का आनलाइन विमोचन.....

सर्वप्रथम मै सत्यम शिवम आप सभी साहित्य प्रेमियों का तहे दिल से अभिनंदन करता हूँ.....आखिरकार वो घड़ी आ ही गयी जिसका हमसबों को कब से इंतजार था।आज यहाँ इस मंच पर हमसब मिल कर "साहित्य प्रेमी संघ" के त्तत्वावधान में प्रकाशित काव्य संग्रह "ह्रदय तारों का स्पंदन" का आनलाइन विमोचन करेंगे।इस अवसर पर आप सभी सम्मिलित कवियों के साथ सभी साहित्य प्रेमीयों की उपस्थिती हमारे लिये सौभाग्य की बात है।

सम्मिलित कवि अपने हाथों से रिबन को काटकर आनलाइन विमोचन के कार्य को क्रियान्वित करे....साथ ही अपने ब्लाग के द्वारा और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइटस के द्वारा सभी को बधाई और शुभकामनाएं दे.........धन्यवाद।


निचे पुस्तक का पूरा विवरण दिया जा रहा है....

(30 कवियों की प्रेम काव्यांजली) 

संपादक:-सत्यम शिवम

काव्य पुस्तक
कुल पृष्ठ:-192
मूल्य रु:-351

सम्मिलित कविः-
1.) ललित शर्मा
2.) विष्णु सक्सेना
3.) विश्वजीत सपन
4.) अर्चना चावजी
5.) गौरव सुमन
6.) कविता विकास
7.) पुरुषोतम वाजपेयी
8.) अनुलता राज नायर
9.) हेमन्त कुमार दुबे
10.) प्रदीप तिवारी
11.) स्वाती वल्लभा राज
12.) प्रियंका जैन
13.) अर्चना नायडू
14.) नीरज द्विवेदी
15.) रागिनी मिश्रा
16.) नीरज विजय
17.) राजेश कुमारी
18.) सुषमा वर्मा
19.) सीमा गुप्ता
20.) रजनी नैयर
21.) वंदना गुप्ता
22.) रोशी अग्रवाल
23.) अंकित गु्प्ता
24.) लक्ष्मी नारायण लहरे
25.) विनोद भगत
26.) देवेन्द्र शर्मा
27.) हेमन्त चौहान
28.) रेखा श्रीवास्तव
29.) अभिषेक सिन्हा
30.) सत्यम शिवम

"साहित्य प्रेमी संघ" के त्तत्वावधान में प्रकाशित काव्य संग्रह "ह्रदय तारों का स्पंदन".....30 भावप्रधान कवियों की प्रेमांजलि काव्य से सुशोभित.....एक अनोखा काव्य संग्रह...जिसमें आपको प्रेम की मनोहारी 150 कवितायें एक साथ पढ़ने का मौका मिलेगा...और साथ ही इन कवियों से रुबरु होने का भी मौका मिलेगा....यह एक अद्भूत स्पंदन है साहित्य ह्रदय में...."ह्रदय तारों का स्पंदन".......[यह काव्य संग्रह अब आपको प्राप्त हो सकती है.....इस काव्य संग्रह की अग्रिम बुकिंग कराने के लिये और अपनी प्रति सुनिश्चित कराने के लिए आज ही हमे मेल से सम्पर्क करे at contact@sahityapremisangh.com या इस नम्बर पर सूचित करे (9934405997)....."अग्रिम बुकिंग कराने पर पुस्तक रिबेटिंग कीमत पर प्राप्त हो सकेगी".........धन्यवाद]
ISBN 
(978-81-921666-2-9)
फेसबुक पेज at http://www.facebook.com/HridayTaaronKaSpandan

विसंगति

    विसंगति

एक बच्ची के कन्धों पर,

                  स्कूल के कंधे  का बोझ है
एक बच्ची घर के लिए,
                  पानी भर कर लाती रोज है
एक को ब्रेड,बटर,जाम,
                      खाने में भी है नखरे
एक को मुश्किल से मिलते है,
                       बासी रोटी  के टुकड़े
एक को गरम कोट पहन कर
                        भी   सर्दी  लगती है 
एक अपनी फटी हुई  फ्राक में
                          भी ठिठुरती   है
एक के बाल सजे,संवरे,
                         चमकीले  चिकने है
एक के केश सूखे,बिखरे,
                         घोंसले  से बने  है
एक के चेहरे पर गरूर है,
                        एक में भोलापन है
इसका भी बचपन है,
                       उसका भी बचपन है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

संयम- दो कविताये

       संयम- दो कविताये
                   1
               चिक
मेरे शयनकक्ष में,रोज धूप आती थी सर्दी  में सुहाती थी
गर्मी में सताती थी
अब मैंने एक चिक लगवाली है और धूप से मनचाही निज़ात पा ली है
समय के अनुरूप
वासना की धूप
जब मेरे संयम की चिक की दीवार से टकराती है
कभी हार जाती है
कभी जीत  जाती है
                      २
         तकिया
जिसको सिरहाने रख कर के,
                           मीठी नींद कभी आती थी
जिसको बाहों में भर कर के
                         ,रात विरह की कट जाती थी
कोमल तन गुदगुदा रेशमी,
                        बाहुपाश में सुख देता था
जैसे चाहो,वैसे खेलो,
                         मौन सभी कुछ सह लेता था
वो तकिया भी ,साथ उमर के,
                        जो गुल था,अब खार  बन गया
बीच हमारे और तुम्हारे,
                           संयम की दीवार   बन गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

Thursday, May 24, 2012

चिक

चिक
मेरे शयनकक्ष में,रोज धूप आती थी
सर्दी  में सुहाती थी
गर्मी में सताती थी
अब मैंने एक चिक लगवाली है
और धूप से मनचाही निज़ात पा ली है
समय के अनुरूप
वासना की धूप
जब मेरे संयम की चिक की दीवार से टकराती है
कभी हार जाती है
कभी जीत  जाती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, May 23, 2012

गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी

 गाँव का वो घर-वो गर्मी की छुट्टी
          
मुझे याद आता है,गाँव का वो घर,
                        वो गर्मी की रातें, वो बचपन सलोना
ठंडी सी  छत पर,बिछा  कर के बिस्तर,
                       खुली चांदनी में,पसर कर के सोना
ढले दिन और नीड़ों में लौटे परिंदे,
                        एक एक कर उन सारों को गिनना
पड़े  रात तारे ,लगे जब निकलने,
                        तो नज़रे घुमा के,  उन सारों को गिनना
भीगा   बाल्टी में, भरे आम ठन्डे,
                         ले ले के चस्के,  उन्हें चूसना    फिर
एक दूसरे को पहाड़े सुनाना,
                          पहेली  बताना,  उन्हें  बूझना   फिर
जामुन के पेड़ो पे चढ़ कर के जामुन,
                           पकी ढूंढना  और  खाना  मज़े से
करोंदे की झाड़ी से ,चुनना करोंदे,
                           पकी खिरनी चुन चुन के लाना  मज़े से
अम्बुआ की डाली पे,कोयल की कूहू,
                           की करना नक़ल और चिल्ला के गाना
,कच्ची सी अमियायें ,पेड़ों पर चढ़ कर,
                           चटकारे ले ले के,मस्ती में    खाना
चूल्हे में लकड़ी  और कंडे जला कर,
                             गरम रोटियां जब खिलाती थी अम्मा
कभी लड्डू मठरी,कभी सेव पपड़ी,
                              कभी ठंडा शरबत   पिलाती थी अम्मा
 कभी चोकड़ी ताश की मिल ज़माना,
                             कभी सूनी सड़कों पे लट्टू  घुमाना
भुलाये  भी मुझको नहीं भूलती  है,
                              वो गर्मी की छुट्टी, वो  बचपन सुहाना

मदन मोहन बाहेती'घोटू'         

  


Monday, May 21, 2012

तू हो गयी है कितनी पराई ।

अथाह मन की गहराई
और मन में उठी वो बातें
हर तरफ है सन्नाटा
और ख़ामोश लफ़्ज़ों में
कही मेरी कोई बात
किसी ने भी समझ नहीं पायी
कानों में गूँज रही उस
इक अजीब सी आवाज़ से
तू हो गयी है कितनी पराई ।

अब शहनाई की वो गूँज
देती है हर वक्त सुनाई
तभी तो दुल्हन बनी तेरी
वो धुँधली परछाईं
अब हर जगह मुझे
देने लगी है दिखाई
कानों में गूँज रही उस
इक अजीब सी आवाज़ से
तू हो गयी है कितनी पराई ।

पर दिल में इक कसर
उभर कर है आई
इंतज़ार में अब भी तेरे
मेरी ये आँखें हैं पथराई
बाट तकते तेरी अब
बोझिल आहें देती हैं दुहाई
पर तुझे नहीं दी अब तक
मेरी धड़कनें भी सुनाई
कानों में गूँज रही उस
इक अजीब सी आवाज़ से
तू हो गयी है कितनी पराई ।

© दीप्ति शर्मा

Sunday, May 20, 2012

देश की कुंडली

       देश की कुंडली
एक तरफ तो भ्रष्ट सारी मंडली है
और दूजी तरफ भज भज मंडली है
क्या नहीं विकल्प कोई तीसरा है,
किस तरह की  देश की ये  कुंडली है
यहाँ पर सियार  है,सारे  रंगे है
लूटने में , देश को, मिल कर लगे है
कोई भी एसा  नज़र आता नहीं है
लुटेरों से जिसका कुछ नाता नहीं है
किस तरह से पेट भर पाएगी जनता,
जो भी रोटी उठाते है,वो जली है
किस तरह की देश की ये कुंडली  है
हर तरफ है,भ्रष्टता का बोलबाला
लक्ष्मी ,स्विस बेंक में ,मुंह करे काला
बढ़ रही मंहगाई अब सुरसा मुखी है
परेशां ,लाचार सी जनता दुखी  है
कहाँ जाए,रास्ता दिखता नहीं है,
आज  काँटों से भरी ,हर एक गली है
किस तरह की ,देश की ये कुंडली है
सह रहे क्यों,इस तरह,ये मार है हम
पंगु क्यों है,हुए क्यों लाचार  है हम
क्यों हमारा खून ठंडा  पड़ गया  है
आत्म का सन्मान क्यों कर मर गया है
फूटना ज्वालामुखी का है सुनिश्चित,
लगी होने धरा में कुछ खलबली  है
किस तरह की देश की ये कुंडली है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ग़ज़लगंगा.dg: रास्ते में कहीं उतर जाऊं?

रास्ते में कहीं उतर जाऊं?
 घर से निकला तो हूं, किधर जाऊं?

पेड़ की छांव में ठहर जाऊं?
धूप ढल जाये तो मैं घर जाऊं?

हर हकीकत बयान कर जाऊं?
सबकी नज़रों से मैं उतर जाऊं?

जो मेरा  जिस्मो-जान था इक दिन
उसके साये से आज डर जाऊं?

जाने वो मुझसे क्या सवाल करे
हर खबर से मैं बाखबर जाऊं.

जिसने  रुसवा किया कभी मुझको
फिर उसी दर पे लौटकर जाऊं?

क्या पता वो दिखाई दे जाये
दो घडी के लिए ठहर जाऊं.

वो भी फूलों की राह पर निकले
मैं भी खुशबू से तर-ब -तर जाऊं.

अपना चेहरा बिगाड़ रक्खा है
उसने चाहा था मैं संवर जाऊं.

मैंने आवारगी बहुत कर ली
सोचता हूं कि अब सुधर जाऊं.

----देवेंद्र गौतम


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Saturday, May 19, 2012

सबसे बड़ा अजूबा

     सबसे बड़ा अजूबा
खुदा की खुदाई से,
खुदा के बन्दों ने,कुछ पत्थर खोद निकाले
और अपनी मृत काया को सुरक्षित रखने को,
विशालकाय पिरेमिड बना  डाले
और ये पिरेमिड आज एक अजूबा है
अपनी संगेमरमर सी सुन्दर बेगम की याद में,
एक बादशाह ने,धरती की कोख से,निकले संगेमरमर
और लगा दिए कब्रगाह में,बना दिया ताजमहल
और ये ताजमहल आज एक अजूबा है
और चीन के शासकों ने,
सुरक्षित रखने को अपनी सीमायें
धरती के सीने से,कितने ही पत्थर खुदवाये
और बना डाली एक लम्बी चौड़ी दीवार
जिसे कोई भी न कर सके पार
ये चीन  की दीवार भी आज एक अजूबा है
इसी तरह ब्राजील में,पहाड़ की चोंटी पर,
हाथ फैलाए क्राइस्ट का पुतला,
या जोर्डन में पेट्रा का महल,
रोम का कोलोसियम
या पेरू का माचु पिचु
ये सारे अजूबे बनाए है ,
भगवान के गढ़े एक अजूबे ने,
जिसे कहते है इंसान
और बनाए गए है,चीर कर सीना,
उस धरती माता का,
जो अपने आप में अजूबा है महान
जिसकी कोख में एक बीज डाला जाता है
तो हज़ारों दानो में बदल जाता है
जिसके सीने पर कई उत्तंग शिखर है
और तन पर लहराते कई समंदर  है
तो आओ,पहले हम इन अजूबों को सराहें
पर उस सृष्टि कर्ता को नहीं भुलायें
जिसके इशारों पर रोज सूरज निकलता है
चाँद घटता और बढ़ता है
हवायें लहलहाती है 
पुष्पों से खुशबू आती है
क्योंकि ये सृष्टि और वो सृष्टि कर्ता ,
जो सृष्टि का संचालन करता है ,
अपने आप में संसार का सबसे बड़ा अजूबा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, May 17, 2012

रिश्ते-मधुर और चटपटे

रिश्ते-मधुर और चटपटे

रिश्तों का दूध,थोड़े से खटास  से,
जब जाता है फट
तो बस छेना बन कर जाता है सिमट
जो प्यार की चाशनी में उबाले जाने पर
बन जाता है रसगुल्ला,
स्वादिष्ट,रसीला  और मनहर
सूजी की छोटी छोटी पूड़ियाँ,
प्यार की स्निघ्ता  में धीरे धीरे तली जाए,
तो बन जाती है फुलकियाँ
जिनको अगर खाया जाए,
आपसी रिश्तों का,चटपटा पानी भर
तो वो गोलगप्पे,स्वाद की घूंटो से,
देते है  खुशियाँ  भर
धनिया और पुदीने के,
पत्तों सा सादा जीवन,
प्यार के मसालों के साथ पिस कर ,
बन जाता है चटपटी चटनी
जीवन की राहें ,जलेबी की तरह,
कितनी ही टेडी हो,
प्यार  के रस में डूब कर,
बन जाती है स्वादिष्ट और रस भीनी
सिर्फ प्यार की शर्करा में ही एसा मिठास है,
जो बिना डायबिटीज के दर से,
जीवन में मधुरता भरता है
रिश्तों में अपनापन,
चाट का वो मसाला है,
जो जीवन को चटपटा और  स्वादिष्ट करता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


Tuesday, May 15, 2012

"बच्चा बिकाऊ है"


पिछले दिनों अचानक
एक खबर है आई,
सरकारी अस्पताल को
किसी ने मंडी है बनाई |

चर्चा थी वहां तो
सब कुछ ही कमाऊ है,
गुपचुप तरीके से वहां
"एक बच्चा बिकाऊ है" |

सुनकर ये खबर
मैं सन्न-सा हुआ,
पर तह तक जाके
मन खिन्न-सा हुआ |


दो दिन का बच्चा एक
बिकने है वाला,
पुलिस-प्रशासन कहाँ कोई
रोकने है वाला !

अस्पताल वालों ने ही
ये बाजार है सजाई,
बीस हजार की बस
कीमत है लगाई |

बहुतों ने अपना दावा
बस ठोक दिया है,
कईयों ने अग्रिम राशी तक
बस फेंक दिया है |

पता किया तो जाना खबर
नकली नहीं असली है,
बच्चे को जानने वाली माँ
"घुमने वाली एक पगली" है |

इस एक समस्या ने मन में
सवाल कई खड़े किये,
मन में दबे कई बातों को
अचानक इसने बड़े किये |

लावारिश पगली का माँ बनना
मन कहाँ हर्षाता है,
हमारे ही "भद्र समाज" का
एक कुरूप चेहरा दर्शाता है |

बच्चे पर बोली लगना
भी तो एक बवाल है,
पेशेवर लोगों के धंधे पर
ज्वलंत एक सवाल है |

सभ्य कहलाते मनुष्यों का
ये भी एक रूप है,
अच्छा दिखावा करने वालों का,
भीतरी कितना कुरूप है |

सरकार से लेके आम जन तक का
इस घटना में साझेदारी है,
किसी न किसी रूप में सही
हम सबकी इसमें हिस्सेदारी है |

समस्या का नहीं हल होगा
कभी हड़ताल या अनशन से,
हर मर्ज़ से हम निजात पाएंगे
बस सिर्फ आत्म-जागरण से |

Monday, May 14, 2012

हिंदी ब्लॉगिंग के ताबूत में कीलें लगातार ठोंकी जा रही हैं

हिंदी ब्लॉगिंग को एक दशक पूरा नहीं हुआ और दशक का ब्लॉगर और ब्लॉग चुना जा रहा है।
यह एक नायाब आयडिया है। इसका नतीजा वही होगा कि सम्मान तो मिलेगा केवल 5 ब्लॉगर्स को अपमान आएगा बाक़ी सबके हिस्से में। न चुने जाने का दंश मालूम नहीं किसके संवेदनशील दिल को कितना ज़्यादा दुखा दे।
गटबाज़ी और रंजिश की वजह से पहले ही बहुत से हिंदी ब्लॉगर्स रूख़सत हो चुके हैं लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग के ताबूत में कीलें लगातार ठोंकी जा रही हैं।

दशक का ब्लॉगर, एक और गड़बड़झाला

Sunday, May 13, 2012

एक बाग़ के दो पेड़

एक बाग़ के  दो पेड़

एक बाग़ में दो पेड़ लगे

दोनों साथ साथ बढे
माली ने दोनों को अपना प्रीत जल दिया
साथ साथ सिंचित किया
समय के साथ,दोनों में फल आये
एक वृक्ष के कच्चे फल भी लोगों ने खाये
कच्ची केरियां भी चटखारे ले लेकर खायी 
किसीने अचार तो किसी ने चटनी बनायी
पकने पर उनकी रंगत सुनहरी थी
उनके रस की हर घूँट,स्वाद से भरी थी
उसकी डाली पर कोयल कूकी,
पक्षियों ने नीड़ बनाया
थके पथिकों ने उसकी छाँव में आराम पाया
और वो वृक्ष आम कहलाया
दूसरे वृक्ष पर भी ढेरों फल लगे
मोतियों के सेकड़ों रस भरे दाने,
एक छाल के आवरण में बंधे
कच्चे थे तो कसेले थे,पकने पर रसीले हुए
हर दाना,अपने ही साथियों के संग बांध कर,
अपने में ही सिमट कर रह गया
एक दूजे संग ,कवच में बंध कर रह गया
पर उसकी टहनियों पर,न नीड़ बन पाये
न उसकी छाँव में राही सुस्ताये
उसका हर दाना रसीला था,पर,
हर दाने का अलग अलग  आकार था
वो वृक्ष अनार था
एक बाग़ में,एक ही माली ने लगाए दो पेड़
दोनों में ही फल लगे,रसीले और ढेर
पर दोनों ही पेड़ों की भिन्न प्रवृती है
कुदरत भी कमाल करती है
एक बहिर्मुखी है,एक अंतर्मुखी है
अपने अपने में दोनों सुखी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

फितरत

    फितरत
चुगलखोर चुगली से,
चोर हेराफेरी से,
                बाज नहीं आता है
कितना ही भूखा हो,
मगर शेर हरगिज भी,
                घास नहीं खाता है
रंग कर यदि राजा  भी,
बन जाए जो सियार,
                  'हुआ'हुआ' करता है
नरक का आदी जो,
स्वर्ग में आकर भी,
                   दुखी  रहा  करता है
लाख करो कोशिश तुम,
पूंछ तो कुत्ते की,
                   टेडी ही रहती है
जितनी भी नदियाँ है,
अन्तःतः सागर  से,
                    मिलने को बहती है
एक दिवस राजा बन,
भिश्ती भी चमड़े के,
                     सिक्के चलवाता है
श्वेत हंस ,बगुला भी,
एक मोती चुगता है,
                   एक मछली खाता है
अम्बुआ की डाली पर,
कूकती कोयल पर,
                   काग 'कांव 'करता है
फल हो या फलविहीन,
तरुवर तो तरुवर है,
                   सदा छाँव  करता है
महलों के श्वानों की,
बिजली का खम्बा लख,
                   टांग उठ ही  जाती है
जिसकी जो आदत है,
या जैसी  फितरत है,
                    नहीं बदल  पाती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, May 12, 2012

इलाज के नाम पर गर्म होता हवसख़ोरी का बाज़ार



पर हमारी टिप्पणी
चमत्कार न होते तो डाक्टर को मौत न आती।

ऐसा देखा जा सकता है कि बहुत बार हायजीनिक कंडीशन में रहने वाले डाक्टर बूढ़े हुए बिना मर जाते हैं जबकि कूड़े के ढेर पर 80 साल के बूढ़े देखे जा सकते हैं।
मिटटी पानी और हवा में ज़हर है लेकिन लोग फिर भी ज़िंदा हैं।
क्या यह चमत्कार नहीं है ?

लोग दवा से भी ठीक होते हैं और प्लेसिबो से भी।

भारत चमत्कारों का देश है और यहां सेहत के मामले में भी चमत्कार होते हैं।
हिप्नॉटिज़्म को कभी चमत्कार समझा जाता था लेकिन आज इसे भी इलाज का एक ज़रिया माना जाता है।
जो कभी चमत्कार की श्रेणी में आते थे, उन तरीक़ों को अब मान्यता दी जा रही है।
एक्यूपंक्चर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है लेकिन उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अगर मान्यता दी जा रही है तो सिर्फ़ उसके चमत्कारिक प्रभाव के कारण।
होम्योपैथी भी एक ऐसी ही पैथी है।
वैज्ञानिक आधार पर खरी ऐलोपैथी से इलाज कराने वालों से ज़्यादा लोग वे हैं जो कि उसके अलावा तरीक़ों से इलाज कराते हैं।
पूंजीपति वैज्ञानिकों से रिसर्च कराते हैं और फिर उनकी खोज का पेमेंट करके महंगे दाम पर दवाएं बेचते हैं।
वैज्ञानिक सोच के साथ जीने का मतलब है मोटा माल कमाने और ख़र्च करने की क्षमता रखना।
भारत के अधिकांश लोग 20-50 रूपये प्रतिदिन कमाते हैं। सो वैज्ञानिक सोच और वैज्ञानिक संस्थान व आधुनिक अस्पताल उनके लिए नहीं हैं। इनकी दादी और उसके नुस्ख़े ही इनके काम आते हैं।
यही लोग वैकल्पिक पद्धतियां आज़माते हैं, जिनके पास कोई विकल्प नहीं होता।
बीमारियां केवल दैहिक ही नहीं होतीं बल्कि मनोदैहिक (Psychosomatic) होती हैं।

...और मन एक जटिल चीज़ है।
मरीज़ को विश्वास हो जाए कि वह ठीक हो जाएगा तो बहुत बार वह ठीक हो जाता है।
मरीज़ को किस आदमी या किस जगह या किस बात से अपने ठीक होने का विश्वास जाग सकता है, यह कहना मुश्किल है।
यही वजह है कि केवल अनपढ़ व ग़रीब आदमी ही नहीं बल्कि शिक्षित व धनपति लोग भी सेहत के लिए दुआ, तावीज़, तंत्र-मंत्र करते हुए देखे जा सकते हैं।
आधुनिक नर्सिंग होम्स के गेट पर ही देवी देवताओं के मंदिर देखे जा सकते हैं। मरीज़ देखने से पहले डाक्टर साहब पहले वहां हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि उनके मरीज़ों को आरोग्य मिले।

आपकी पोस्ट अच्छी है लेकिन चिकित्सा के पेशे को जिस तरह सेवा से पहले व्यवसाय और अब ठगी तक में बदल दिया गया है, उसी ने जनता को नीम हकीमों के द्वार पर धकेला है।

मै- स्वामी डा.मोम बाबा बी.टेक

 मै- स्वामी डा.मोम बाबा बी.टेक.

मेरे पिताजी चाहते थे मै इंजीनियर  बनू,मैंने बी.टेक.पास किया

मेरी माताजी चाहती थी मै डॉक्टर बनू,सो मैंने करेस्पोंडेंस कोर्स से
होमियोपेथी पढ़ कर अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाया.
मेरे दादाजी चाहते थे कि मै  कर्मकांडी पंडित बनू,तो उन्होंने मुझे
बचपन से कर्मकांड सिखलाया .मेरी दादीजी चाहती थी कि मै
कथावाचक संत बनू,तो मैंने उनकी आज्ञा को शिरोधार्य कर
भागवत,रामायण और शास्त्रों का अध्ययन किया.और फिर
सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतर कर,मैंने हर प्रोफेशन को ट्राय
किया और अंत में  इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मेरी दादीजी कितनी सही थी
और आज मै स्वामी डा.मोम बाबा बी.टेक.,कथावाचक संत हूँ.
इंजिनियर रहता तो रेत,बजरीऔर सीमेंट मिला कर बड़ी बड़ी
इमारतें खड़ी करता पर आज मै अपने प्रवचनों में कथा, भजन,और
संस्मरण मिला कर ऐसी कांक्रीट बनाता हूँ कि भक्तों के दिल में
जम कर ,स्वर्ग के सपनो कि ईमारत खड़ी हो जाती है-बीच बीच में,
मै थोड़े थोड़े घरेलू नुस्खे और चुटकुलों की छोटी छोटी,मीठी मीठी,
गोलियां देकर अपनी डाक्टरी के ज्ञान प्रदर्शन की भड़ास भी पूरी
कर लेता हूँ.कथा के पहले और बाद के कर्मकांडों व कुछ भक्तों की
विपदाओं को हरने के लिए की गयी विशेष पूजाएँ भी दादाजी के
आशीर्वाद से काफी धनप्रदायिनी होती है-और दादीजी के आशीर्वाद ने
मुझे एक प्रख्यात कथावाचक संत बना दिया है जिसके अमृत वचन
टी.वी. के कई चेनलों पर  दिन रात प्रसारित होते रहते है.अब मै एक पूजनीय
संत हूँ,-भक्त मुझे माला पहनाने को और मेरा आशीर्वाद पाने को
आयोजकों को मोटा चढ़ावा चढाते है
.मै इवेंट मेनेजर हूँ ,मेरी कथा में लाखों की उमड़ती भीड़ के लिए
पंडाल,टी.वी.,लाउड स्पीकर आदि की व्यवस्था मेरे ही लोग करते है
मै एम.बी.ए. की तरह अपने पूरे बिजनेस का मेनेजमेंट कुशल और
 लाभ दायक तरीके से करता हूँ जैसे भजन और प्रवचन के केसेट और
सी.डी.बना कर बेचना,मासिक पत्रिका छपवा कर अपने फोटो युक्त
फ्रोंट पेज पर अपने विचार और भक्तों के अनुभव छपवा कर अपना प्रचार
करना,या अपनी हर कथा पर १०८ या अधिक महिलाओं की कलश यात्रा
को बेंड बाजों के साथ शहर में घुमा कर अपना प्रचार करना आदि आदि-
मै    सी.ए. याने चार्टर्ड अकाउंटटेंट हूँ-मै जनता हूँ की  चढ़ावे  की इतनी कमाई को,
किस तरह टेक्स फ्री किया जाए या विदेशी रूट से काले पैसे को सफ़ेद बनाया जाये
कथा के साथ साथ और भी पैसे कमाने के कई गुर मैंने सीख लिए है ,जैसे,
भागवत कथा में रुकमनी विवाह पर भक्त महिलाओं से रुकमनी जी के दहेज़ में
साडी और आभूषण चढ़वाना,या कृष्ण सुदामा के मिलन प्रसंग पर भक्तों  से चावल
चढ़ा कर असीम दौलत प्राप्ति  का लालच देना आदि-इस तरह का चढ़ावा इतना आ जाता है
की समेटना मुश्किल हो जाता है अत:दूसरे दिन वही चढ़ावा कथा स्थल के बाहर भगवान
का प्रसाद बतला कर अच्छे दामो में बिक जाता है-इस तरह 'हींग लगे ना फिटकड़ी,रंग भी चोखो आय'
की कहावत को चरितार्थ करता हूँ.
प्रभू की असीम कृपा से ,कई तीर्थ स्थलों में मेरे आश्रम चल रहे है और मेरे पास अपार धन सम्पदा है
जो कदाचित इंजिनियर या डाक्टर बन कर मै नहीं कमा सकता था.-सत्ता और विपक्ष के कई
नेता मेरे परम भक्त है जिससे मेरे वर्चस्व  की वृद्धि होती है-मेरी तस्वीरें कितने ही भक्तों के
पूजा गृह में सु शोभित है. और अब मेरे बच्चों को अपने केरियर के बारे में सोचने की
कोई जरुरत ही नहीं है क्योंकि वो बाप की विरासत ही संभालेंगे अत :अभी से मेरी संतति
संत गिरी की ट्रेनिंग ले रही है.अरे हाँ,एक बात तो ना आपने पूछी,न मैंने बताई,-आप उत्सुक होंगे
मै मोम बाबा कैसे बना-इस नाम करण के पीछे कई कारण है-पहला ,जब भी कथा में कोई मार्मिक
प्रसंग आता है,मै अपने हाथो की कुशलता से अश्रु दायक द्रव अपनी आँखों पर लगा लेता हूँ
और मेरे चक्षुओं से आंसू की बरसात होने लगती है-भक्त समझते है की मै भाव विव्हल होकर
 मोम की तरह पिघल रहा हूँ पर असल में मै भाव विव्हल होकर अपने भाव बढाता हूँ.दूसरा,
मोम बत्ती की तरह मै लोगों के अन्धकार मय जीवन में प्रकाश भरता हूँ और तीसरा मुख्य
कारण है  की मेरा नाम मदन मोहन है जो काफी लम्बा है और भक्तों की जुबान पर छोटे नाम
जल्दी चढ़ते है सो मैंने ही अपने नाम के प्रथम अक्षरों से पहले म मो बाबा  सोचा पर थोडा अटपटा
लगा तो उलट कर मोम बाबा कर दिया जो सार्थक भी था.-आज मै जो भी हूँ,जनता की धर्म
के प्रति जागरूकता और पुन्य लाभ की आकांक्षा का प्रतिफल हूँ और आदरणीया दादीजी की
दूर दर्शिता,प्रेरणा और आशीर्वाद से हूँ-तो भक्तों !प्रेम से बोलो-राधे  राधे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

क्या यही प्यार है ? - आकाश कुमार - www.akashsingh307.blogspot.in


क्या यही प्यार है ?
बड़ी सिद्दत से प्यार की दो बातें लिखी है | आपकी मंत्ब्य्यों की अपेक्छा है |

प्यार को किसी नाम की जरुरत नहीं होती |
इससे ज्यादा कोई चीज दुनियां में खुबसूरत नहीं होती ||
                  मैंने भी किया था प्यार बड़ी शान से |
                  पर ये क्या हुआ भी तो एक नादान से ||
प्यार की परिभाषा, ना प्यार का मतलब आता था |
मन ही मन उनकी हर अदा मेरे दिल को भाता था ||
                  उनकी हर अदा में छलकता प्यार देखा |
                  थोडा नहीं बेसुमार देखा ||
आगे देखो प्यार का खेला |
मधुर मिलन की आई बेला ||
                  प्यार का मौसम सावन आया |
                  दो से हमको एक बनाया ||
कई साल अब बीत गए |
हम वादों में जुट गए ||
                  दिन भर प्यार की कसमे खाना |
                  झूठ मुठ का रोना धोना ||
प्यार प्यार में तकरार हो गया |
देखते ही देखते साडी मेहनत बेकार हो गया ||
                  जिस प्यार को हमने सबकुछ माना |
                  उसी ने किया हमको बेगाना ||

Friday, May 11, 2012

माटी की महक-ऊँचाइयों की कसक

माटी की महक-ऊँचाइयों की कसक

पहली पहली बारिश पर ,
माटी की सोंधी सोंधी महक
फुदकते पंछियों का कलरव,चहक
भंवरों का गुंजन
तितलियों का नर्तन
आम्र तरु पर विकसे बौरों की खुशबू
कोकिला की कुहू.कुहू
खिलती कलियाँ,महकते पुष्प
हरी घांस पर बिखरे शबनम के मोती,
या दालान में पसरी,कुनकुनी  धूप
कितना कुछ देखने को मिलता था
जब मै जमीन से जुड़ा था
अब मै एक अट्टालिका में बस गया हूँ,
जमीन से बहुत ऊपर,धरा से दूर
ऊपर से अपने लोग भी बोने से ,
रेंगते नज़र आते है,मजबूर
अब ठंडी बयार भी नहीं सहलाती है
हवाये सनसनाती,सीटियाँ बजाती है
अब सूरज को लेटने के लिए दालान भी नहीं है,
वो तो बस आता है
और खिड़की से झांक कर चला जाता है
कई बार सोचता हूँ,
जमीन से इतना ऊंचा उठ कर भी,
मेरे मन में कितनी कसक है
मैंने कितना कुछ खोया है,
न भंवरों का गुंजन है,न माटी की महक है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, May 9, 2012