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Friday, February 27, 2015

आंटी का दर्द

          आंटी का दर्द

जब मैं थी छोटी ,
नन्ही मुन्नी सी गुड़िया ,
लोग मुझे कहते थे 'क्यूटी '
जब मैं बड़ी हुई,
जवानी और निखार आया,
लोग मुझे कहने लगे' ब्यूटी'
शादी के बाद ,
पति ने दिया ढेर सा प्यार,
 और कहते थे मुझे 'स्वीटी'
बाद में जब गृहस्थी में जुटी,
तो बच्चों और परिवार की सेवा में ,
लग गयी मेरी 'ड्यूटी'
और अब जब जवानी रूठी,
हो रही हूँ मोटी ,
और खो जाया करती है मेरी ' शांती'
जब अच्छे खासे ,
बड़े बड़े लोग भी,
मुझे बुलाते है कह कर 'आंटी'
ये लोगो का आंटी कहना
मेरे मन को चुभता है,
बन कर के नश्तर
इंग्लिश में 'आंट 'याने चींटी,
तो क्या मेरी हालत ,
हो गयी है चींटी से भी बदतर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


राहुल बाबा का चिंतन

        राहुल बाबा का  चिंतन

मम्मी  ने ये बोला था तू पी एम बनेगा,
     सब सर झुका के रहेंगे तेरे हुज़ूर में
किस्मत ने मगर खेल कुछ दिखलाया इस तरह,
      टपका जो आसमान से ,लटका खजूर में
जब तक छपरपलंग था ,बंदा मलंग था,
      लेकिन गए है इस कदर ,हालात अब बदल
करवट को बदलने की भी अब तो जगह नहीं,
      स्लीपर की साइड बर्थ है ,सोने को आजकल
बेहतर विदेश जाऊं मैं ,चिंतन के नाम पर ,
       मेरे  उबलते खून को ठंडक  तो  मिलेगी
मम्मा ,मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष बनादो,
      आहत मेरे  इस दिल को कुछ राहत तो मिलेगी

घोंटू  

Monday, February 23, 2015

यूं बीत गया बस जन्मदिवस

         यूं  बीत गया बस जन्मदिवस

 हम ख़ुशी मनाते भूल गए ,घट गयी उमर है एक बरस
                                     यूं बीत गया बस जन्मदिवस
कुछ मित्र ,सगे और सम्बन्धी ,जतलाने आये हमें प्यार
कुछ पुष्पगुच्छ लेकर आये ,कुछ लेकर आये उपहार
कुछ 'व्हाटस एप 'सन्देश मिले ,मेसेज मिले  मोबाईल पर
लम्बी हो उम्र ,सुखी जीवन ,और खुशियां बरसे जीवन भर
फिर' केक' कटी,गाने गाये,और हुयी पार्टी,खान पान
यह चला सिलसिला बहुत देर,तन अलसाया ,आयी थकान
उपहार प्यार का हमें दिया ,पत्नी ने खुश हो  विहंस ,विहंस
सारा दिन गुजरा  मस्ती में ,अगले दिन से फिर जस के तस
                                       यूं बीत गया बस जन्म  दिवस

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Sunday, February 22, 2015

चौहत्तरवें जन्मदिन पर -जीवन संगिनी से

      चौहत्तरवें जन्मदिन पर -जीवन संगिनी से

उमर बढ़ रही ,पलपल,झटझट
 हुआ तिहत्तर मैं   ,तुम अड़सठ 
एक दूसरे पर अवलम्बित ,
एक सिक्के के हम दोनों पट
      सीधे सादे ,मन के सच्चे    
      पर दुनियादारी में कच्चे
     बंधे भावना के बंधन में,
    पर दुनिया कहती हमको षठ
कोई मिलता ,पुलकित होते 
याद कोई आ जाता ,रोते
तुम भी पागल,हम भी पागल,
 नहीं किसी से है कोई घट
       पलपल जीवन ,घटता जाता
      भावी कल ,गत कल बन जाता
       कभी चांदनी है पूनम की,
      कभी  अमावस का श्यामल पट
इस जीवन के  महासमर में
हरदम हार जीत के डर  में
हमने हंस हंस कर झेले है,
पग पग पर कितने ही संकट
      मन में क्रन्दन ,पीड़ा  ,चिंतन
      क्षरण हो रहा,तन का हर क्षण
      अब तो ऐसे लगता जैसे ,
      देने लगा  बुढ़ापा   आहट

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, February 14, 2015

          हम मुफ्तखोर है
                       १
सूरज की धूप हमें ,मुफ्त मिले दिनभर ही ,
          और रात मुफ्त मिले ,चांदनी  सुहानी है
मुफ्त हवा के झोंको की ठंडक मिलती है ,
           मुफ्त में ही बादल भी ,बरसाते पानी है
मज़ा स्वाद खुशबू का ,मुफ्त लिया करते हम ,
              पकती पड़ोसी के घर जब बिरयानी है  
मुफ्त खुशबुएँ लेते,खिले पुष्प,कलियों की,
               हमें मुफ्तखोरी की ,आदत पुरानी है
                                २
 मुफ्त हुस्न सड़कों पर ,खुला खुला  दिखता है,
                 और मुफ्त में ही हम ,आँख सेक लेते है   
नए नए फैशन का ,मुफ्त ज्ञान हो जाता ,
                 जहाँ मिले परसादी ,माथ टेक  लेते है
मुफ्त रोटी लंगर की ,बड़ी स्वाद लगती है,
                  मुफ्त मिले दारू तो ,छक कर पी लेते है
मुफ्त में कंप्यूटर , बिजली और पानी का ,
                   वादा जो करता , हम वोट  उसे  देते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, February 13, 2015

औलाद का सुख

           औलाद का सुख

हे परवरदिगार !
ये खाकसार
है तेरा बहुत शुक्रगुजार
तूने मुझे बक्शें है दो दो चश्मेचिराग
दोनों ही बेटे ,लायक,काबिल और लाजबाब
अच्छे ओहदों पर दूर दूर तैनात है
अपनी वल्दियत में  मेरा नाम लिखते है,
ये मेरे लिए फ़क्र की बात है 
लोग उनकी तारीफ़ करते है,गुण  गाते है
और वो भी जी जान से अपना फर्ज निभाते है
पर काम में इतने मशगूल  रहते है कि ,
अपने माबाप के लिए ,
बिलकुल भी समय नहीं निकाल पाते है
मेरे मौला !
तेरा तहेदिल से शुक्रिया
तूने जो भी दिया ,अच्छा दिया
पर काश!
तू मुझे दे देता एक और नालायक औलाद
जो भले ही कोई बड़ा काम तो नहीं करती ,
पर बुढ़ापे में तो रहती हमारे साथ
उम्र के इस मोड़ पर हमारा  ख्याल रखती ,
और सहारा देती ,पकड़ कर हमारा हाथ

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

उम्र-ठगिनी

                      उम्र-ठगिनी

वक़्त चलता था हमारे साथ में ,
                      उम्र के संग तबदीली यूं  छागयी
नींद भी गुस्ताख़ अब होने लगी,
                       हम न सोये,उसके पहले आ गयी
आजकल तो ढलता है दिन बाद में,
                       उसके पहले ढलने लग जाते है हम
साँझ घिरते ,लगता छाई रात है ,
                       और उस पर नींद ढाती है सितम
सपन भी तो आजकल आते नहीं ,
                        कहते है कि आते आते थक गए
एक भी अंजाम तक पहुंचा नहीं ,
                         हमारे संग इस तरह वो पक गए   
 हमारी मर्ज़ी मुताबिक़ कल तलक,
                         चला करती थी हवायें ,बेदखल
अपनी मन मर्जी की सब मालिक हुई ,
                      बदला बदला रुख है उनका आजकल     
आफताबी चमक थी हममें कभी ,
                       पीड़ाओं की बदलियों ने  ढक  लिया
'माया ठगिनी' को बहुत हमने ठगा ,
                        'उम्र ठगिनी'ने हमें पर ठग लिया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, February 9, 2015

प्रगति और रूढ़ियाँ

                प्रगति और रूढ़ियाँ

पथप्रदर्शक,ज्ञानवर्धक,यंत्र छोटा सा मगर ,
           दूर बैठे प्रियजनों से मिलाता ,सन्देश देता
छोटे से गागर में जैसे कोई सागर सा भरा हो ,
            इसी कारण आज मोबाइल बना ,सबका चहेता
उँगलियों से अब कलम का पकड़ना कम हो रहा,
            मोबाईल स्क्रीन पर सब उंगलियां है फेरते
सुबह उठ के 'फेस 'अपना चाहे देखे या नहीं,
            सबसे पहले मोबाईल पर ,'फेस बुक'है देखते
प्रगति हमने बहुत कर ली ,हो रहे है आधुनिक,
              चन्द्रमा ,मंगल ग्रहों पर रखा हमने हाथ है
रूढ़िवादी सोच लेकिन और पुरानी भ्रांतियां ,
               आज भी चिपकी हुई,  रहती  हमारे साथ है
'रेड लाईट 'पर भले ही ,हम रुकें या ना रुकें,
                बिल्ली रास्ता काट देती,झट से रुक जाते है हम
कोई भी शुभ कार्य हो या जा रहे हो हम कहीं,
                 छींक जो देता है कोई ,तो सहम जाते   कदम

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Saturday, February 7, 2015

बात -रात की

              बात -रात की

तुम पडी हुई उस कोने में,मैं पड़ा हुआ इस कोने में
ऐसे भी मज़ा कहीं कोई  ,आता है जानम  सोने में
मेरी आँखों में उतर रही ,निंदिया  घुल कर ,धीरे धीरे
खर्राटे बन कर उभर रहे , साँसों के स्वर ,धीरे धीरे
तुम भी लगती जागी जागी ,हो शायद इसी प्रतीक्षा में,
मैं पास तुम्हारे आ जाऊं ,करवट भर कर ,धीरे धीरे
तुम सोच रही ,मैं पहल करूँ ,मैं सोच रहा तुम पहल करो,
लेटे है इस उधेड़बुन में, हम और तुम एक  बिछोने में
तुम पड़ी हुई उस कोने में,मैं पड़ा हुआ इस कोने में
ना तो कोई झगड़ा हम मे ,ना ही कोई  मजबूरी है
तो फिर ऐसी क्या बात हुई ,जो हम में तुम में दूरी है
मैं  सीधी  करवट एक भरता ,आ जाते है हम तुम करीब,
तुम  उलटी करवट  ले लेती  ,बढ़ जाती हम मे दूरी है 
समझौतो का हो समीकरण ,यह मधुर मिलन का मूलमंत्र ,
टकराव अहम का अक्सर बाधा बनता प्यार संजोने में 
तुम पडी हुई उस कोने में ,मैं  पड़ा हुआ इस कोने में

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

सब मौसम अच्छे

        सब मौसम अच्छे

जब तुम अच्छे,जब हम अच्छे
गुजरेंगे  सब  मौसम   अच्छे
प्यार भरी ठंडक  गरमी  में,
और सर्दी में बंधन   अच्छे
 तुम भी सीधे,हम भी भोले,
नहीं बनावट के कुछ लच्छे
गाँठ पड़े ना और ना टूटे  ,
प्रेम सूत  के धागे   कच्चे
हमें भुला कर रम जाएंगे,
अपने अपने घर सब बच्चे
बस हम और तुमसाथ रहेंगे ,
तुम संग गुजरें,सब दिन अच्छे 
साथ निभाना ,तुम जीवन भर,
बन कर मेरे हमदम  सच्चे

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मैं हूँ झाड़ू

                     मैं  हूँ  झाड़ू

सेक रहे है अपनी अपनी रोटी , नेता , सभी  जुगाड़ू
राजनीति  का शस्त्र बनी मैं ,किसे सुधारूं किसे बिगाड़ूँ
                                                मैं  हूँ झाड़ू
सुबह सुबह गृहणी हाथों में आती,घर का गंद बुहरता
स्वच्छ साफ़ हर कोना होता,और सारा घरबार चमकता
सड़कों पर और गलियों में जो बिखरा रहता सारा कचरा
मैं ही उसे साफ़ करती हूँ, गाँव,शहर  रहता है  निखरा
फिर भी घर के एक कोने में पडी उपेक्षित मैं रहती हूँ
कोई मेरे दिल से पूछे ,मैं कितनी  पीड़ा  सहती हूँ
घर भर तो मैं साफ़ करूं पर,कैसे मन की पीर बुहारूं
                                               मैं हूँ झाड़ू
 कहते है बारह वर्षों मे ,घूरे के भी दिन फिर जाते
लेकिन बरस सैकड़ों बीते,मेरे अच्छे दिन को आते
'आप'पार्टी ,लड़ी इलेक्शन ,और चुनाव का चिन्ह बनाया
मोदी जी ने मुझे उठाया और स्वच्छ अभियान  चलाया
तब से  बड़े  बड़े नेताओं, के हाथों   की शान बनी मैं
जगह जगह 'बैनर्स 'पर दिखती,एक नयी पहचान बनी मैं
चाहूँ स्वच्छ प्रशासन कर दूँ और व्यवस्था सभी सुधारूं
                                                 मैं  हूँ झाड़ू
एक सींक जब रहे अकेली ,तो खुद ही कचरा कहलाती
कई सींक मिलती ,झाड़ू बन ,घर का कचरा दूर हटाती
यही एकता की महिमा है ,यही संगठन की शक्ति है
कचरा सभी साफ़ हो जाता ,जहाँ जहाँ झाड़ू फिरती है
मोदी जी ने ,अच्छे दिन के सब को सपने दिखलाये है
और किसी के ,आये न आये ,मेरे अच्छे दिन   आये है
मेरी शान बढ़ गयी कितनी,खुशियां इतनी ,कहाँ सम्भालू
                                                  मै  हूँ  झाड़ू

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

शैल रचना: बेमौसम तब घन बरसेगा

शैल रचना: बेमौसम तब घन बरसेगा: गुज़र गए जो लम्हें पल लौट के कब आने वाले उम्र की दरिया बहती जाये वक्त कहाँ थम जाने वाले , मासूम बड़ा समझाऊँ कैसे  उन्मत्त पखेरु मन को ...

Friday, January 30, 2015

शादी-चार चित्र

              शादी-चार चित्र
                        १
एक खाली होता हुआ घोसला ,
एक चुसा हुआ आम
एक मधु विहीन छत्ता
फिर भी मुस्कान ओढ़े हुए ,
एक निरीह इंसान
दुल्हन का बाप
                   २
वर का पिता
गर्व की हवा से भरा गुब्बारा
रस्मो के नाम पर ,अधिकारिक रूप से,
 भीख मांगता हुआ ,दंभ का मारा
एक ऐसा प्राणी ,
जिसका पेट बहुत भर चुका है पर
फिर  भी कुछ और खाने को मिल जाए,
इसी जुगाड़ में तत्पर
सपनो में डूबा हुआ इंसान
मन में दादा बनने का लिए अरमान
                       ३
बेंड बाजे के साथ ,
मस्ती में नाचते हुए ,उन्मादी
व्यंजनों से भरी प्लेटों को ,
कचरे में फेंकते हुए बाराती
                      ४
दहेज़ के नाम  पर,
अपने बेटे का सौदा कर
अच्छी खासी लूट खसोट के बाद
खुश था  दूल्हे का बाप
लड़कीवालों ने अपने दामाद को ,
दहेज़ में दी है एक बड़ी कार
और बहू के नाम ,एक अच्छा फ्लेट दिया है ,
शायद वो अनजान थे कि उन्होंने ने,
इनके परिवार में,
विभाजन का बीज बो दिया है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

Monday, January 26, 2015

ये औरतें कैसी होती है ?

          ये औरतें कैसी होती है ?

यूं तो सुबहो शाम ,
अपने पति से झगड़ती रहती है
पर पति कुछ दिनों भी ,
किसी काम से बाहर जाते है ,
तो उनके बिना ,
वो समय नहीं काट पाती ,बोअर होती है
ये औरतें कैसी होती है ?
सुबह पति से कहती है ,
घर में कपडे हो गए बहुत है
उन्हें रखने के लिए ,
एक नयी अलमारी की जरुरत है
और शाम को जब पार्टी में,
जाने को तैयार होने लगती है
तो क्या पहनू,मेरे पास तो कपडे ही नहीं है,
ये शिकायत करती है
सभी की ये आदत,एक जैसी होती है
ये औरतें भी कैसी होती है ?
यूं तो पतिजी की 'डाइबिटीज'पर
पूरा कंट्रोल दिखाती  है
पर जब गाजर का हलवा बनाती है ,
तो बड़े चम्मच से पति को चखाती है
मीठी मीठी बातों की चाशनी से ,
पति के दिल को भिगोती है
ये औरते कैसी होती है?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

यू टर्न

               यू टर्न

हुआ करता था कुछ ऐसा ,हमारी नींद का आलम,
      ख्वाब भी पास आने पर ,जरा सा हिचकिचाते थे
यूं ही बस बैठे बैठे ही ,झपकियाँ हमको आती थी,
       कभी हम आँख मलते थे,कभी गर्दन झुलाते थे
खराटोँ  की ही धुन से नींद का आगाज़ होता था,
      और अंजाम ये था ,पास वाला सो न पाता था,
पड़े रहते थे बेसुध ,नहीं कुछ भी होश रहता था ,
     हमें रावण का भैया ,कह के ,घरवाले बुलाते थे
लड़ी है आँख तुमसे जबसे है आँखे नहीं लगती ,
    मुई उल्फत ने जबसे दिल में आ के डेरा डाला है
तुम्हारी याद आती ,ख्वाब आते ,नींद ना आती ,
        हमारी आदतों ने इस तरह 'यू टर्न'   मारा  है  

घोटू

चाय पर चर्चा

                    चाय पर चर्चा

मोदी जी ने ओबामा जी को भारत बुलाया
आत्मीयता दिखा कर ,अपना दोस्त बनाया
देश के हित  में ,अमेरिका से कई करार किये
चाय पर चर्चा कर ,आपसी सम्बन्ध सुधार लिये
ये चाय पर चर्चा का मुद्दा तो,
 अब लोगों को नज़र आया है
पर मैंने तो इसी चाय की चर्चा के सहारे ,
हंसी खुशी से अब तक अपना  जीवन बिताया है
हम मिया बीबी ,सुबह की चाय पर ,
दिनभर क्या करना है,इसकी चर्चा करते है
और शाम की चाय की चर्चा में,
दिन भर क्या क्या किया,
एक दूसरे को बतलाया करते है
इस चाय की चुस्की के साथ हमें बहुत कुछ मिला है
हमें एक दूजे से ,न कोई शिकवा है ,न  ग़िला है
इसी सामंजस्य के कारण हमारी केमेस्ट्री ठीक है ,
और हम मिया बीबी में अच्छी पटती है
चैन से नींद आती है और रात मज़े से कटती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Saturday, January 24, 2015

केजरीवाल-४ विपरीत परिस्तिथियाँ

    केजरीवाल-४
विपरीत परिस्तिथियाँ
           
अरविन्द  याने की कमल ,
दोनों समानार्थी ,
याने कि भाई,भाई
पर दिल्ली की राजनीति में,
दोनों की लड़ाई
सुबह सुबह ,
सूरज की किरणों के पड़ने से,
'अरविन्द'  खिलता है
पर प्रकृति  का यह नियम,
दिल्ली की राजनीतिमें ,
उल्टा ही  दिखता है
यहाँ पर ,दो किरणे ,
एक किरण वालिया और
एक किरण बेदी  ,
जब से मैदान में उतरी है ,
अरविंद थोड़ा घबराने लगा है
सर पर टोपी और गले में मफलर बाँध,
खुद को किरणों से बचाने लगा है
थोड़ा   कुम्हलाने लगा है
कमल जब तक कीचड़ में है ,
 झुग्गी झोंपड़ियों में है ,
अपनी सुन्दर छवि से ,
सबको लुभाता है
पर कमल ,लक्ष्मीजी का प्रिय है,
 उस पर लक्ष्मीजी  विराजती है,
और उनकी पूजा में,
उन पर चढ़ाया जाता है
लक्ष्मी और कमल का भी ,
ऐसा ही नाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, January 21, 2015

कश्मीर के हालात पर

 कश्मीर के हालात पर 


नयी सोच के फ़ौवारों में प्रतिशोध की अगन बुझा लें
आआो शांति का पर्व मनाकर उन्मत्त आक्रोश भगा दें ,,

सहना आसान कहर मौसम का पर इंसा पर इंसा की त्रासें
उन्मुक्त गगन में कैसे विचरें अंगारों पे करवट लेतीं रातें ,,

आह भरे साँसों के धड़कन की कब सुख से सोकर जागेगी रैना
असहाय सवाल सब पूछ रहे कब होगी रक्तरंजित वस्ती में पुरनिमा ,,

कटुता के कंटक शूल खींचकर दिल की कुटिया में दीप जला दें
आओ जन मानस की वीरां क्यारी में समता के सुन्दर फूल खिला दें ,,

धू-धू कर जल रहा वर्तमान हमारा हुँह ; लोग कहते इतिहास पढ़ो
इतिहास तो बीता कल था प्यारे चलो भावी कल पे नूतन जिल्द मढ़ो ,,

कोई ज़हन ना सहमा रह जाये आओ भरम की सब दीवार ढहा दें
सम्बन्धों के ठूंठ होने से पहले आओ सौहार्दमयी जहाँ में बौर खिला दें ,,

अलसायों को आज़ जगाने आई निद्रा कोसों दूर भगाने आई
निखिल सृष्टि का करूँ सिंगार जग से इतना करूँ मैं प्यार ,,

हर घर आँगन दीवार खड़ी है दरार पड़ी हर दिल में है
मैल मलाल की किसमें धोऊं जब प्रदूषण गंगाजल में है ,,

प्रत्यंचा चढ़ी निशाने पर है राजवरदाई हैं आज़ कहाँ
अर्जुन संकट धर्म खड़े हैं आज़ गीता के भगवान कहाँ ,,

सबका सुख अपना लगता है दुःख की गागर कहाँ डुबोऊँ
कर्म जगत से बिरत सभी हैं क्या छोड़ूँ औ क्या कुछ बोऊँ ,,

सीताएं झुलसें अग्नि परीक्षा में द्रुपद सुताओं का केश खुला
पिस रही कुचक्र की चकिया में किस-किस से मैं करूँ गिला ,,

आज़ जरुरत आन पड़ी है घन संकट के हैं घिर गहराये
वीर प्रसूता जननी फिर दे दे जुझारू रण में अपनी ललनाएँ ,,

आज़ भी विषम परिस्थितियों में हर नारी पन्ना धाय बन जाएगी
राष्ट्र को पड़ी जरुरत यदि तो हर नर की हड्डी वज्र बन जाएगी ,,

हमें गर्व स्वतंत्रता हैं जनक हमारा भारत भूमि जान से प्यारी माता
घर्म संस्कृति पावन बहन हमारी ऊँचा मस्तक ग़ौरव अपना भ्राता ,,

कण-कण में श्री भगवान कृष्ण हैं चप्पे-चप्पे में श्री राम भगवान
शिरोमणी यह प्यारा देश हमारा मोर मुकुट हैं इसके चारों धाम ।

                                                                          शैल सिंह







Monday, January 19, 2015

उचटी नींद

        उचटी नींद

जब नींद कभी उड़  जाती है
तो कितनी ही भूली बिसरी ,यादें आकर जुड़ जाती है
फिरने लगते है एक एक कर, मन की माला के मनके
तो सबसे पहले याद हमें ,आने लगते दिन बचपन के
गोबर माटी से पुता हुआ ,वह घर छोटा सा, गाँव का
गर्मी की दोपहरी में भी वो सुख पीपल की छाँव का 
वह बैलगाड़ियों पर चलना,वो रामू तैली की घानी
मंदिर की कुइया पर जाकर ,वो हंडों  में भरना पानी
करना इन्तजार आरती का,लेने  प्रसाद की एक चिटकी
रौबीली डाट पिताजी की ,माताजी की मीठी झिड़की
वो गिल्ली ,डंडे ,वो लट्टू,वो कंचे ,वो पतंग बाज़ी
भागू हलवाई की दूकान  की गरम जलेबी वो ताज़ी
निश्चिन्त और उन्मुक्त सुहाना ,प्यारा  बचपन मस्ती का
बस पलक झपकते बीत गया,जब आया बोझ गृहस्थी का
रह गया उलझ कर यह जीवन,फिर दुनिया के जंजालों में
कुछ दफ्तर में ,कुछ बच्चों में,कुछ घरवाली,घरवालों में
कुछ नमक तैल के चक्कर में ,कुछ दुःख ,पीड़ा ,बिमारी में
प्रतिस्पर्धा आगे  बढ़ने की ,कुछ झंझट ,जिम्मेदारी मे
पग पग पर नित संघर्ष किया ,तब जाकर कुछ उत्कर्ष हुआ
मन चाही मिली सफलता तो ,इस  जीवन में कुछ हर्ष हुआ
सुख तो आया ,उपभोग मगर ,कर पाऊं ,नहीं रही क्षमता
हो गया बदन था जीर्ण क्षीर्ण ,कठिनाई से लड़ता लड़ता
कुछ घेर लिया बिमारी ने ,आ गया बुढ़ापा कुछ ऐसा
कुछ बेगानी संतान हुई ,जब सर पर चढ़ ,बोला पैसा
कुछ यादें शूलों सी चुभती ,तो कुछ यादें सहलाती है
जब नींद कभी उड़ जाती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


 

पिताजी

       पिताजी

पिताजी ,
सख्त थे ,दांतों  तरह,
जिनके अनुशासन में बंध ,
हम जिव्हा की तरह ,
बोलते,हँसते, गाते,मुस्कराते रहे
चहचहाते रहे
और टॉफियों की तरह जिंदगी का
स्वाद उठाते रहे
वो,लक्ष्मणरेखा की तरह ,
हमें अपनी हदें पार करने को रोकते थे,
बार बार टोकते थे
और कई बार हम,
 उनकी सख्ती को,कोसते थे
 पर कभी भी ,जब सख्त से सख्त दांतों में,
दर्द और पीड़ा होती है,
तो वह दर्द कितना असहनीय होता है,
ये वो ही महसूस कर पाता  है ,
जिसके दांतों में दर्द होता है
मुझे  ,उनके चेहरे पर ,
वही पीड़ा दिखी थी
जब शादी के बाद ,
मेरी बहन बिदा हुई थी,
या थोड़े दिन की छुट्टियों के बाद,
मैं और मेरे बच्चे ,
वापस अपनी अपनी नौकरी पर लौटते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'