यकीनन वो प्यार नहीं था,
पर था मै दाल गलाने में,
मुझे पता था वो दुर भागती है,
फिर भी था मै लक आजमाने में।
हर बार द्विअर्थी बात कर,
उसे मै फँसाता रहा,
पूँछने पर,मै उसे,
कुछ और समझाता रहा।
जो दिल में न था,
वो जुबां पे कैसे आती,
हम मिलते ही कब थे,
जो आँखे ये समझा पाती।
पर कोई ना समझ पाया,
रिश्ते की इस चाल को,
ना वो समझी,ना मै समझा,
एक दुजे के दिल के हाल को।
कभी प्यार हुआ करता था,
मेरे दिल में उसके लिए,
वो समझ कर ना समझी,
किसी और के लिए।
रिश्तों का चेहरा बदल कर,
वो दुनिया घुमाती रही,
सच्चाई को हरदम,
मुझसे छुपाती रही।
पर मै अपने शब्दों में भी,
उसे बुरा ना कह पाउँगा,
चाहे लाख दर्द दे वो मुझे,
सब सह जाउँगा।
हो गयी अब दुर मुझसे वो,
तो मै हूँ दिल को ये समझाने में,
यकीनन वो प्यार नहीं था,
पर था मै दाल गलाने में।
मुझे पता था वो दुर भागती है,
फिर भी था मै लक आजमाने में।
कवि परिचयः-
सुधीर कुमार सिन्हा,
(साफ्टवेयर इंजीनियर),
गया,बिहार।




5 comments:
यकीनन वो प्यार नहीं था...बहुत सुंदर भावों से प्रेम के प्रति अपनी बात रखी है आपने...खुबसुरत कविता...बधाई।
बहुत सुंदर कविता और शब्द चुनाव,अच्छी लगी।
उम्दा कविता,लिखते रहिए,शुभकामनाएं।
रिश्तों का चेहरा बदल कर,
वो दुनिया घुमाती रही,
सच्चाई को हरदम,
मुझसे छुपाती रही
wah wah kya panktiya hai;
really this poem is veray good
जो दिल में न था,
वो जुबां पे कैसे आती,
हम मिलते ही कब थे,
जो आँखे ये समझा पाती।
very good keep it up best of luck!
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