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Wednesday, April 6, 2011

वो भोली गांवली

जलती हुई दीप बुझने को व्याकुल है,
लालिमा कुछ मद्धम सी पड़ गई है,
आँखों में अँधेरा सा छाने लगा है,
उनकी मीठी हंसी गुनगुनाने की आवाज,
बंद कमरे में कुछ प्रश्न लिए,
लांघना चाहती है कुछ बोलना चाहती है।
सम्भावना! एक नव स्वपन की मन में संजोये,
अंधेरे को चीरते हुए,मन की ब्याकुलता को कहने की कोशिश में,
मद्धम -मद्धम जल ही रही है,
"वो भोली गांवली" सुन्दर सखी,
आँखों में जीवन की तरल कौंध,सपनों की भारहीनता लिए,
बरसों से एक आशा भरे जीवन बंद कमरे में गुजार रही है।

दूर से निहारती,अतीत से ख़ुशी तलाशती,
अपनो के साथ भी षड्यंत्र भरी जीवन जी रही है।

छोटी सी उम्र में बिखर गई सपने,
फिर -भी एक अनगढ़ आशा लिए,
नये तराने गुनगुना रही है।

सांसों की धुकनी,आँखों की आंसू,
अब भी बसंत की लम्हों को,
संजोकर ”’साहिल”” एक नया सबेरा ढूंढ़ रही है।
मन में उपजे असंख्य सवालों की एक नई पहेली ढूंढ़ रही है।

बंद कमरे में अपनी ब्याकुलता लिए,
एक साथी-सहेली की तलाश लिए,
मद भरी आँखों से आंसू बार-बार पोंछ रही है।
वो भोली सी नन्ही परी,
हर-पल,हर लम्हा,
जीवन की परिभाषा ढूंढ़ रही है।

कवि परिचयः-
लक्ष्मी नारायण लहरे
युवा साहित्यकार पत्रकार
कोसीर,09752319395


9 comments:

Sawai Singh Rajpurohit said...

जलती हुई दीप बुझने को व्याकुल है,
लालिमा कुछ मद्धम सी पड़ गई है,
आँखों में अँधेरा सा छाने लगा है,
उनकी मीठी हंसी गुनगुनाने की आवाज,


बहुत ही सुंदर कविता

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति!

सारा सच said...

nice कृपया comments देकर और follow करके सभी का होसला बदाए..

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (09.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

LAXMI NARAYAN LAHARE said...

आदरणीय ,SAWAI SINGH JI,डा .रूपचंद्र जी ,सारा सच जी ,सत्यम -शिवम् जी
सप्रेम अभिवादन .....
आप लोंगों का स्नेह और मार्ग दर्शन के लिए आभार प्रगट करता हूँ ,आशा है आपलोंगों का स्नेह मिलता रहेगा
सत्यम -शिवम् जी ... ''वो भोली गांवली'' चर्चा मंच में शामिल हुई जानकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई
आपको बहुत -बहुत ह्रदय से धन्यवाद ...... जो इस रचना को आपने आपनी चर्चा में शामिल कर इस कविता की महत्त्व को
और बढ़ा दिए मैं आभार प्रगट करता हूँ ......
मैं एक शब्द कहना चाहूंगा .....सत्यम शिवम् -सुन्दरम ......
सादर
लक्ष्मी नारायण लहरे ...

anupama's sukrity ! said...

बंद कमरे में अपनी ब्याकुलता लिए,एक साथी-सहेली की तलाश लिए,मद भरी आँखों से आंसू बार-बार पोंछ रही है।वो भोली सी नन्ही परी,हर-पल,हर लम्हा,जीवन की परिभाषा ढूंढ़ रही है।

गहन अभिव्यक्ति .....
समाज कि व्यवस्था पर तीखा प्रहार ....
कटु किन्तु सत्य कहती हुई अनमोल रचना .....
बहुत बहुत बधाई आपको ....!!

LAXMI NARAYAN LAHARE said...

आदरणीया ,anupama

जी सप्रेम साहित्याभिवादन

आपको बहुत- बहुत धन्यवाद ....
आपको ढेर सारी शुभकामनाएं ,हार्दिक बधाई ...
सादर
लक्ष्मी नारायण लहरे

Nisha Mittal said...

सुंदर अभिव्यक्ति,सुंदर प्रवाह,सुंदर रचना.

गुड्डोदादी said...

आँखों में जीवन की तरल कौंध,सपनों की भारहीनता लिए,

बरसों से एक आशा भरे जीवन बंद कमरे में गुजार रही है।
सुंदर भावपूर्ण