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Friday, April 29, 2011

परवरिश


टखनो तक जमी हुई मिटटी और गली के मोड़ वाले पीपल के सूखे पत्तो को इधर-उधर उड़ाते देखा तो अनुमान लगाया, " आंधी आई होगी!"
स.के. साहब सरकारी दफ्तर में क्लर्क हैं,कस्बे के बाहर कागजी काम से जाते रहते हैं,
पत्नी, इकलौते बेटे के साथ शहर में रहती थी!
बेटा M.A. की पढाई के लिए शहर गया था, शहर का दाना-पानी लगा नहीं और सेहत दुबली होने लगी!
तभी उनकी धर्म-पत्नी ने शहर जाने की ठानी, आखिर पढाई का सवाल था!
यूँ तो स.के. साहब की उम्र हो गई है, पर अपने सारे काम अब भी बहुत अच्छे से कर लेते हैं!
नलका चला कर एक मटका पानी भरा,और कंठ भिगो कर आँगन साफ़ करने में लग गये!
"अंकल आ गए? मेरा काम किया या नहीं?"
देखा तो सुशांत अपने घर की दीवार के ऊपर से झांक कर बोल रहा था!
सुशांत अभी कुछ ही महीनो पहले बगल वाले घर में रहने आया था किराये पर!
विद्यार्थी है, न जाने कितनी प्रतियोगी परीक्षाओ के फॉर्म भरता रहता है.
"हा भाई, तुम्हारा फॉर्म ले आया हूँ, थोड़ी देर में आता हूँ!"

स.के.साहब का लाडला था, उसकी पढाई की लगन देखकर तो स.के.साहब ने अपनी पत्न्नी 
को कह दिया था-ये लड़का जरुर किसी दिन नाम रोशन करेगा!

पीपल के पत्तो को इकठा किया और कोने में रखे कूड़े दान में दाल दिया.

यूँ तो घर पर ही चाय बना लेते थे, पर कभी मन हो तो बगल के टी-स्टाल पर चले जाते थे,
चाय के साथ थोड़ी मोहल्ले की खबर भी लग जाती थी!
टी-स्टाल के लिए निकले तो सोचा-फॉर्म भी देते हुए निकलता हु सुशांत को!

जैसे ही सुशांत के घर का दरवाजा खोला, तो देखा एक लड़की बगीचे में बैठी 
पढ़ रही है!
दरवाजे की आवाज से भी ध्यान नहीं भटका!
"सुशांत है?"

लड़की ने देखा और बोली
"नमस्ते अंकल, सुशांत तो बहार गया है अभी अभी!
आप फॉर्म वाले अंकल हो न ? लाइए मुझे ही दे दीजिये!"

"तुम??" स.के.साहब ने बड़ी विस्मयता से पुछा!

"अंकल मैं मनाली हूँ, सुशांत और मैं साथ ही पढ़ते हैं!
साथ  में पढाई अच्छे से हो जाती है, सो अक्सर आ जाती हूँ!
उसने बताया था की आप हमारे फॉर्म लाते हो, 
दो लाये हो न अंकल?"

"है??हां ...हाँ दो ही लाया हु
चलो तुम पढो मैं निकलता हु, मन लगाकर पढना दोनों"

"अच्छा अंकल" बड़ी ही मासूमियत से जवाब आया!

"कितनी प्यारी बच्ची है!""अच्छा तो सुशांत ने दो फॉर्म इस्सी वजह से मंगवाए थे"
यही सोचते हुए स.के.साहब टी-स्टाल तक पहुचे.

"और मुरली बाबु कैसे हो?"
"अरे स.के.साहब आप? आइये अभी चाय बनवाई है, सही टाइम पर आये हो! कब लौटे?"
मुरली बाबु बोले!
दो बेटियों के पिता थे मुरली बाबु ! बड़ी बेटी कॉलेज में आ गई थी, पर ये कहकर प्राइवेट फॉर्म भरवाया 
की "आजकल की हवा ख़राब है, जितने आँखों के सामने रहे बच्चे, उतना अच्छा है"
छोटी अभी स्कूल में पढ़ती है!

"धन्यवाद, अभी कुछ ही देर पहले लौटा था, आते हुए सुशांत को फॉर्म देते हुए आ रहा हु!"
स.के साहब ने उत्तर दिया!

मुरली बाबु-"सुशांत कौन? वही जो आपके घर के बगल वाले घर में रहता है?"

स.के.साहब -"हाँ, बड़ा ही होनहार बच्चा हैं"

मुरली बाबु चौंके -" अरे, होनहार? स.के.साहब कोई गलतफहमी हुए होगी आपको!
आप यह कम ही रहते हो, सो ज्यादा नहीं जानते!
ये सुशांत तो एक नंबर का आवारा लड़का है, अपनी दुपहिया पर
रोज किसी लड़की को बिठा कर डोलता है, आजकल तो वो इसके घर भी आने लगी है!
ऐसे बच्चे ही तो माता-पिता के नाम पर कलंक लगते हैं!"

एक ही साँस में, इतने विश्वास के साथ कहे थे ये शब्द मुरली बाबु ने!

स.के. साहब कुछ नहीं बोले, चाय ख़त्म करो, और कहा 
"अच्छा मुरली बाबु निकलता हु, सुबह दफ्तर जाना है!"

पैसे देने के लिए रुके तो रेडियो पर मुख्या समाचार आ रहे थे!
स.के.साहब ने चाय वाले से कहा" भाई थोड़ी आवाज तेज कर दो, आज यह आने की जल्दी में सुबह
अखबार भी नहीं पढ़ पाया था, जरा सुन लूँ"

"आकाशवाणी में आपका स्वागत है, पेश हैं अब तक के मुख्या समाचार!
I.A.S. की परीक्षा में सुशांत चौधरी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया..........

बस यही एक वाकया सुन पाए थे स.के. साहब और बस ख़ुशी से
झूम उठे, " अरे ये तो हमारा सुशांत है"
सुशांत के आगे हमारा शब्द कब जुड़ा, उन्हें खुद को समझ नहीं आया!

मुड कर मुरली बाबु को देखा तो वो झेंप गए.
बिना कुछ कहे स.के साहब घर की तरफ चल दिए.

"अंकल" सुशांत ने पुकारा और आकर पैर छु लिए!
"I topped I.A.S. Exam"
स.के. साहब- "पता है बेटा, मैंने सुना अभी रेडियो पर.सच में मुझे बहुत ख़ुशी हुए!
जानता था तुम्हारी लगन जरुर काम आयेगी, 
अरे मनाली बिटिया, तुम्हारा मुह क्यों उतरा है,थोड़ी देर पहले तो बड़ा चहक रही थी? "

"अंकल मेरा तो 5th रंक ही आया है.." रुआंसी होकर मनाली ने जवाब दिया!

तो सुशांत और स.के.साहब ठहाके लगाकर हसने लगे!
"टॉप-टेन में तो हो न?" दोनों ने एक साथ कहा!

"चलो बच्चो, आज रात का खाना मेरे घर पर!अपने दोस्तों को भी बुला लेना!
तुम्हारी जीत की ख़ुशी में आज हम सब साथ खायेगे"
स.के.साहब बोले
मनाली-"अरे वह अंकल ! पक्का हम रात में आ जायेगे!"

शाम को स.के साहब कुछ खाने की तयारी में जुटे थे, बच्चो को दावत देनी थी!
तभी दूध वाला आया, उससे खबर मिली
की मुरली बाबु की बड़ी बेटी अभी किसी  लड़के से कोर्ट में शादी करके घर आई है!

स.के.साहब ने मन में सोचा-अक्सर जो लोग बच्चो पर ज्यादा पाबन्दी लगते हैं, या दुसरो के बच्चो को कोसते हैं, उनकी परवरिश में कमी रह ही जाती है!

इतने में सुशांत और मनाली आ गये अपने दोस्तों के साथ.
"अंकल भूख लगी है"मनाली ने चहकते हुए कहा!

@copyright गुंजन  झाझारिया 

7 comments:

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही सुंदर सामाजिक कहानी..बिल्कुल एक मँझे हुए..कहानीकार की तरह लिखा है आपने..बहुत सार्थक और बेहतरीन..लिखते रहिए..शुभकामनाएं।

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (30.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

Gunjan said...

धन्यवाद सत्यम...

udaya veer singh said...

bhavnaon ki sunder abhivyakti .shukrya .

vivek said...

very nice and inspiring

vivek said...

very nice and inspiring

हिमाँशु अग्रवाल said...

अत्यंत सरल और संदेशात्मक रचना l हार्दिक बधाई ...